जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने हाल ही में यह बेतुका दावा किया कि “थाईवान में कोई इमरजेंसी” जापान के लिए “ज़िंदगी-मौत का संकट” बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को जापान की इस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर सतर्क रहना चाहिए कि वह युद्ध के बाद के अंतर्राष्ट्रीय शासन को खुले तौर पर कमजोर कर रहा है और सैन्यवाद को पुनर्जीवित कर रहा है।
चीन अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के एशिया-प्रशांत केंद्र में विशेष रूप से नियुक्त अनुसंधान फेलो श्यांग हाओयू ने बताया कि जापान की मौजूदा प्रधानमंत्री के तौर पर साने ताकाइची ने संसदीय बहस के औपचारिक अवसर पर उपरोक्त बातें अचानक नहीं कीं ।यह जापानी दक्षिणपंथी ताकत द्वारा “चीन के खतरे का विचार” और थाईवान जलडमरूमध्य तनाव भूनकर युद्ध के बाद के “शांति संविधान” के नियंत्रण से बाहर निकलने और फिर से सैन्यवाद को बढ़ावा देने का बहाना ढूंढ़ने की कोशिशों का नया उदाहरण है। जापान के इस खतरनाक प्रवृत्ति पर सभी पक्षों को बड़ा ध्यान देना चाहिए।
चीन अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के सहयोगी शोधकर्ता सू श्याओह्वेइ का मानना है कि ताकाइची की हाल की गलत बातें दो मुख्य वजहों से प्रेरित थीं: पहली, निजी राजनीतिक ज़रूरतें, अपनी सत्ता की स्थिति को मज़बूत करने के लिए घरेलू दक्षिणपंथी ताकतों की इच्छा को पूरा करना; और दूसरी, जापान के राजनीतिक दक्षिणपंथी झुकाव के पूरे ट्रेंड की गहरी झलक। इसका आखिरी लक्ष्य “सरासर रक्षात्मक प्रतिरक्षा” के सिद्धांत को तोड़ना है। जापान की गलत हरकतें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करेंगी।
जापान के जानकार लोगों ने ताकाइची की हाल की गलतियों के बारे में साफ़ राय भी दी है। जापानी विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी और पूर्वी एशियाई समुदाय संस्थान के निदेशक सुन छिश्यांग ने बताया कि थाईवान चीन का हिस्सा है, और यह दावा कि यह जापान के “अस्तित्व के संकट” से जुड़ा है, बेबुनियाद है। थाईवान का सवाल एकदम चीन का अंदरूनी मामला है, और जापानी सरकार को थाईवान के सवाल पर अपने राजनीतिक वादों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
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(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)