
मुंबई (फरीद शेख): जब धुरंधर का पहला लुक सामने आया था, तभी दर्शकों का माहौल बदल गया था। सिर्फ पोस्टर देखकर ही लोगों को लगा कि यह किसी आम बोल्ड-एक्शन फ़िल्म की बात नहीं है यह कुछ बड़ा, बहुत बड़ा होने वाला है। रणवीर सिंह का तीखा रूप, संजय दत्त की ठोस मौजूदगी, अक्षय खन्ना की रहस्यमयी आँखें, और आर. माधवन का गरिमा से भरा व्यक्तित्व… स्टारकास्ट ही अपने आप में एक महाकाव्य जैसा लग रहा था।
फिर आया ट्रेलर और उसने तो दिलों में बाकायदा जगह बना ली। ट्रेलर ने ऐसा वादा किया जिसे निभाना आसान नहीं होता, लेकिन अब जब फ़िल्म रिलीज़ हो चुकी है, तो कहना पड़ेगा कि धुरंधर ने न सिर्फ उम्मीदों को पूरा किया, बल्कि कई गुना ज़्यादा दिया है।
आदित्य धर इस पीढ़ी के उन कुछ निर्देशकों में आते हैं जो बड़े कैनवास पर भी कहानी को इंसानी स्पर्श देना नहीं भूलते। धुरंधर में उनका नियंत्रण हर फ्रेम में साफ़ दिखता है चाहे वह एक राजनीतिक मीटिंग हो, किसी गुप्त ऑपरेशन की तैयारी हो, या किसी किरदार का अकेला भावुक क्षण। उनकी सबसे बड़ी ताक़त यह है कि वे सिर्फ रोमांच पैदा नहीं करते, बल्कि रोमांच को मतलब देते हैं।
इस फ़िल्म में उन्होंने इतिहास, राजनीति, भावनाएँ, आतंक, और देश की सुरक्षा से जुड़ी वास्तविक जटिलताओं सब कुछ एक ऐसे ताने-बाने में पिरोया है जो न तो भारी लगता है, न बोरिंग , बल्कि दर्शक को लगातार पकड़कर रखता है।
फ़िल्म की नींव दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरित है IC-814 का अपहरण (1999) और 2001 का भारतीय संसद हमला इन घटनाओं ने देश की सुरक्षा को जिस तरह हिला दिया था, उसी संवेदनशीलता को फ़िल्म अपने शुरुआती दृश्यों में बखूबी पकड़ती है। यह सिर्फ “बेस” नहीं है; यह वह भावनात्मक जमीन है जिसके ऊपर पूरी कहानी खड़ी होती है। आदित्य धर इन घटनाओं का उपयोग सिर्फ रोमांच बढ़ाने के लिए नहीं करते, बल्कि यह दिखाने के लिए कि भारत किस परिस्थिति में खड़ा था और उस समय खुफ़िया एजेंसियों पर कैसी अमानवीय दबाव की परतें चढ़ीं।

फ़िल्म का सबसे चौंकाने वाला और प्रभावित करने वाला हिस्सा इसका आर्काइवल फुटेज का प्रयोग है। 9/11, अंतरराष्ट्रीय आतंकी हमले, और भारत को निशाना बनाने की साजिशों से जुड़ी ऑडियो क्लिप्स सब कुछ इतनी सटीकता से कहानी में पिरोया गया है कि लगता है दर्शक किसी डॉक्यूमेंट्री-जैसी सच्चाई को देख रहा हो। इन दृश्यों में देशभक्ति का भाव जागता है, लेकिन बिना किसी अतिश्योक्तिपूर्ण नारा–बाज़ी के। यह “देशभक्ति” नहीं, बल्कि “जागरूकता” पैदा करता है कि दुनिया कितनी अस्थिर है, और भारत कितनी रणनीतिक बुद्धिमत्ता से इन चुनौतियों का सामना करता रहा है।
यह हिस्सा फिल्म को एक अलग ऊँचाई पर ले जाता है एक ऐसी ऊँचाई जहाँ मनोरंजन और वास्तविकता बेहद खूबसूरती से मिलते हैं। रणवीर सिंह का हमज़ा फ़िल्म की आत्मा है। उनकी आँखों का गुस्सा, चेहरे की बेचैनी, और किरदार के भीतर की खरोंचें सब इतनी प्रामाणिक लगती हैं कि दर्शक का जुड़ाव अपने आप हो जाता है।दूसरे हाफ़ में उनका रूप लगभग राक्षसी ऊर्जा से भरा हुआ दिखता है एक ऐसा किरदार जो भावनाओं से टूटकर खतरनाक बन चुका है। फ़िल्म के एक्शन दृश्यों में वे जान डाल देते हैं हर सीन में आग है, वजन है, और एक कच्ची सच्चाई है.
फिल्म के सहकलाकारों ने फिल्म में जान डाली हैं . अक्षय खन्ना एक शांत, डरावना, चालाक, ऐसा विलेन जो दिमाग़ से खेलता है। संजय दत्त की एंट्री से ही ऐसा लगता है जैसे किसी बम का फ्यूज जल चुका हो।आर. माधवन ने किरदार की गरिमा, नियंत्रण और गहराई को पकड़ा है और उनके बिना कहानी अधूरी है।अर्जुन रामपाल ने यह साबित कर दिया है कि खामोशी में ही ताकत होती है ।सारा अर्जुन की पहली ही फिल्म से ऑडियंस पर गहरा असर छोड़ा है। हर किरदार कहानी को और खतरनाक रूप से ज़िंदा बनाता है।
लगभग 196 मिनट की कहानी इतनी मजबूत एडिटिंग और टेम्पो के साथ आगे बढ़ती है कि समय का पता ही नहीं चलता। बैकग्राउंड स्कोर इस साल का नहीं अगले कई सालों का यादगार संगीत है। यह सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि कहानी की ताकत है।
फ़िल्म हिंसा दिखाती है, लेकिन बस उतनी जितनी कहानी की ज़रूरत है। असली तीखापन है: राजनीतिक चालों में, खुफिया एजेंसियों की खामोश जद्दोजहद में, हमज़ा की भावनात्मक यात्रा में और सत्ता, विश्वासघात, गठजोड़ की उस दुनिया में जहाँ इंसान अपनी पहचान खो देता है। फ़िल्म का अंत इस तरह से किया गया है कि दर्शक कुर्सी से उठते ही एक ही सवाल मन में होता है “अब आगे क्या?”
कहानी जिस मुकाम पर पहुँचकर रुकती है, वह पार्ट टू के लिए परफेक्ट लॉन्चपैड है। ईद 2026 अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक इंतज़ार है एक बेचैनी कि धुरंधर की दुनिया और कितनी खतरनाक, और कितनी जटिल, और कितनी विस्फोटक होने वाली है।
धुरंधर अपने विशाल पैमाने, गहरी रिसर्च, असल घटनाओं की संवेदनशील पेशकश, दमदार अभिनय और आदित्य धर की तेज़, साहसी और परिपक्व दृष्टि के कारण सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक बड़ी सिनेमाई उपलब्धि बन जाती है। फ़िल्म का हर फ्रेम दिखाता है कि टीम ने कितना दिल, कितना समय और कितनी मेहनत इसमें लगाई है। निर्माता ज्योति देशपांडे, लोकेश धर और आदित्य धर ने B62 Studios और Jio Studios के साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया रची है जो व्यापक भी है, वास्तविक भी, और सिनेमाई तौर पर बेहद समृद्ध भी। उन्होंने किसी भी पहलू को हल्के में नहीं लिया—बड़े सेट्स, तकनीकी गुणवत्ता, कहानी की जटिलता, किरदारों की गहराई हर चीज़ को पूरा महत्व देते हुए धुरंधर को एक ऐसा अनुभव बनाया है जो भारतीय सिनेमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
इस फ़िल्म को ज़रूर थिएटर्स में देखें क्योंकि धुरंधर का असली अनुभव बड़े पर्दे पर ही महसूस होता है।
निर्देशक/लेखक: आदित्य धर
कलाकार: रणवीर सिंह, संजय दत्त, अक्षय खन्ना, आर. माधवन, अर्जुन रामपाल, सारा अर्जुन, राकेश बेदी
अवधि: 196 मिनट
रेटिंग: 4
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