डेस्कः 9 दिसंबर 2025 से ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया में पहला ऐसा कानून लागू किया है जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों को टिकटॉक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य सोशल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करने से रोकता है। इस नियम के तहत सभी प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि युवा यूजर्स उनकी सेवा तक न पहुंच सकें।
इसकी गंभीरता और दूरगामी नतीजों के कारण दुनिया भर की सरकारें अब यह जांच कर रही हैं कि क्या इसी तरह के फ्रेमवर्क कहीं और आजमाए जा सकते हैं या नहीं और इसके क्या असर हो सकते हैं। कई देशों ने उम्र के आधार पर सिस्टम देखे हैं, जबकि दूसरे माता-पिता की मंजूरी, नेशनल फायरवॉल या बड़े पैमाने पर सेंसरशिप पर निर्भर हैं। कुछ अन्य नए तरीकों पर विचार कर रहे हैं। वहीं, भारत भी क्या सोशल मीडिया का यूज करने वालों की उम्र लिमिट तय करेगा या फिर इस पर कोई कदम उठाएगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव और विभिन्न देशों के नियम
यूनाइटेड किंगडम: ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट लागू है जो यूजर्स को नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट से बचाता है, पर सोशल मीडिया की न्यूनतम उम्र तय नहीं करता।
फ्रांस: 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर अकाउंट खोलने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी, लेकिन वेरिफिकेशन तकनीकी चुनौतियों से जूझ रही है।
जर्मनी, इटली, नॉर्वे: 13-16 साल के बच्चों के लिए अभिभावक की सहमति आवश्यक; नॉर्वे 15 साल की न्यूनतम उम्र बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
यूरोप: डेनमार्क जैसे देशों ने 16 साल की न्यूनतम एक्सेस उम्र के लिए प्रस्ताव पास किया है।
एशियाई देशों में सोशल मीडिया पर कड़ी पाबंदियां
चीन: “ग्रेट फायरवॉल” के जरिए विदेशी सोशल मीडिया पूरी तरह ब्लॉक, माइनर मोड में बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित किया जाता है।
मलेशिया: 2026 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की योजना।
अफगानिस्तान, ईरान, म्यांमार, उत्तर कोरिया: इंटरनेट और सोशल नेटवर्क पर व्यापक सेंसरशिप और प्रतिबंध।
अमेरिका में डिजिटल बाल सुरक्षा की भूमिका
संघीय स्तर पर COPPA कानून के तहत 13 साल से कम बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी संरक्षित है, लेकिन प्लेटफॉर्म तक पहुंच को नियंत्रित नहीं किया जाता। कई अमेरिकी राज्य जैसे नेब्रास्का, टेक्सास, यूटा ने उम्र जांच और अभिभावक की अनुमति के नियम बनाए हैं।
भारत में सोशल मीडिया उपयोग की उम्र सीमा पर बहस
ऑस्ट्रेलिया के फैसले के बाद भारत में भी इस विषय पर चर्चा तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह से प्रतिबंधित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके बजाय डिजिटल शिक्षा, जागरूकता, और माता-पिता के लिए समर्थन कार्यक्रम ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज में सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी (SHUT) क्लिनिक के डॉ. मनोज शर्मा ने कहा कि परिवारों को टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल के लिए मार्गदर्शन और इंतजाम जरूरी हैं। वहीं, काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका सुधीर ने बताया कि छोटे बच्चों में स्क्रीन एडिक्शन और मानसिक प्रभावों को रोकने के लिए केवल कानून नहीं, व्यापक काउंसलिंग जरुरी है।
भारत फिलहाल शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को प्राथमिकता देते हुए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
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