Last Updated: November 7, 2026

Dainik Savera Times Logo

चीन की वजह से जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर बड़ा बदलाव

December 27, 2025

चीन की वजह से जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर बड़ा बदलाव

इंटरनेशनल डेस्क : दस साल पहले फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए जलवायु समझौते की ओर नजर डालते हैं तो एक दशक की उसकी यात्रा में खट्टे-मीठे अनुभव होते हैं। इन अनुभवों पर चर्चा से पहले हमें जानना चाहिए कि उस समझौते का मकसद था, जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक रूख स्पष्ट करना और एक ऐसी दुनिया बनाने पर जोर देना, जिसमें तापमान की वृद्धि रूके और जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से दुनिया और आने वाली पीढ़ियों को बचाना। एक तरह से यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की ऐतिहासिक कानूनी संधि है, जिसका अहम मकसद वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगीकरण के पूर्व की भांति मौजूदा स्थिति के हिसाब से दो डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखते हुए उसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का प्रयास करना है। 

ट्रंप के दूसरे शासन काल में अमेरिका पेरिस समझौते से पीछे हट गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह इस अंतरराष्ट्रीय कानूनी संधि से अलग हो गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया के देशों ने अपने यहां इस समझौते के लिहाज से कार्बन उत्सर्जन रोकने की दिशा में काम नहीं कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर सकारात्मक बदलाव की तस्वीर सामने आई है। दुनिया में जैसे-जैसे औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है, वैसे-वैसे बिजली की मांग भी बढ़ी है। उपभोक्ता कारणों की वजह से भी ऊर्जा और बिजली की जरूरतें बढ़ीं हैं। बिजली की इस जरूरत को ज्यादातर देश थर्मल पावर के जरिए हासिल बिजली से पूरा करते हैं। थर्मल मतलब कोयले की सहायता से बिजली का उत्पादन। लेकिन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की हालिया जारी रिपोर्ट के मुताबिक पेरिस समझौते के बाद के दशक यानी 2015 से 2024 के बीच अंतरराष्ट्रीय पर कोयले की मांग में कमी दर्ज की गई है। दिलचस्प यह है कि इसमें सबसे बड़ा योगदान चीन का है। इसकी वजह यह है कि चीन ने अपने यहां बिजली के उत्पादन के लिए कोयले की बजाय नवीकरण और दूसरे माध्यमों पर भरोसा बढ़ाया है। कुछ ऐसी ही स्थिति भारत की भी है। भारत भी नवीकरणीय ऊर्जा के मोर्चे पर लगातार प्रगति कर रहा है। इसकी वजह से एशियाई मुल्कों में बिजली उत्पादन में कोयले की मांग घट रही है। 

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 से 2014 के दशक की तुलना में 2015 से 2024 के दशक में कोयले की मांग में जो बढ़ोत्तरी हो रही थी, वह घटते-घटते करीब 50 प्रतिशत रह गई है। इसे ऐसे समझते हैं। जैसे बिजली की मांग बढ़ने के चलते हर साल बिजली उत्पादन के लिए कोयले की जो मांग मान लेते हैं कि दो टन सालाना थी, और वह साल दर साल बढ़ रही थी, वह घटकर अब एक टन रह गई है। एजेंसी का मानना है कि कोयले की मांग में इस गिरावट की वजह पेरिस समझौता है। जिसमें सबसे बड़ा योगदान चीन का है। 

चीन में विगत दो दशकों में तेज औद्योगिक विकास हुआ है। जिसकी वजह से वहां उत्पादन बढ़ा है। इसकी वजह से चीन में लगातार कोयले का उपयोग बढ़ रहा था। क्योंकि उसे अपने उद्योगों के लिए बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करना था। इसके लिए उसके सामने सबसे बड़ा विकल्प कोयले से ही बिजली उत्पादन था। लेकिन पेरिस समझौते के बाद चीन ने अपने रूख में बदलाव लाने में कामयाब हुआ है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, विगत तीन वर्षों से चीन में कोयला आधारित बिजली उत्पादन तकरीबन स्थिर है। दरअसल चीन ने पेरिस समझौते के बाद अपनी सौर और पवन ऊर्जा क्षमता का तेजी से विकास कर रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा नहीं कि चीन में बिजली की मांग घटी है, बल्कि वहां बिजली की मांग बढ़ी ही है। इसके बावजूद यहां कोयले से बिजली उत्पादन में गिरावट देखी जा रही है। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आ रहे बुनियादी परिवर्तन पर आधारित है। चीन में कच्चे इस्पात उत्पादन में हाल के दिनों में कमी भी आई है। चूंकि इस उद्योग में बिजली की मांग घटी है, इसलिए चीन पर दबाव भी कम हुआ है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की जानकार लॉरी मायलिविर्टा के भी चीन में कोयला आधारित बिजली उत्पादन में विगत 18 महीनों से लगातार हो रही कमी की वजह इसे ही मानती हैं। इसका असर कोयला निर्यातक देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, मंगोलिया, कनाडा और भारत पर भी पड़ेगा। इनमें से ज्यादातर देश चीन को लंबे समय से कोयले का निर्यात करते रहे हैं। वैसे भारत ने विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में नवीकरण ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत काम किया है। अगर भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता का विस्तार होता है, तो देश अपने विकास, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को जल्द ही हासिल कर सकता है। वैसे भारत ने साल 2030 तक कार्बन गैसों की  उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 33-35 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही भारत ने साल 2030 तक अपनी 40 प्रतिशत ऊर्जा का उत्पादन गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से करने का भी लक्ष्य रखा है। 

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

 

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें