
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। 11 जनवरी की रात मीडिया से बातचीत में उन्होंने डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेकर बेहद आक्रामक बयान दिया। ट्रंप का कहना था कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा केवल कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली दो बेपहिया गाड़ियों पर निर्भर है और अमेरिका “किसी भी तरह” वहां अपना नियंत्रण स्थापित करेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्रीनलैंड के लिए “कोई न कोई डील” होनी ही चाहिए।
नाटो सहयोगियों की नाराज़गी के सवाल पर ट्रंप का जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने साफ कहा कि अगर इससे नाटो को नुकसान पहुंचता है, तो भी अमेरिका मजबूर नहीं है कि वह पीछे हटे। उनके मुताबिक, बाकी देशों को यह समझना चाहिए कि उन्हें अमेरिका की जरूरत, अमेरिका को उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा है।
ट्रंप का यह रवैया केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है। 3 जनवरी की सुबह अमेरिका ने वेनेज़ुएला पर सैन्य हमला किया। राजधानी काराकस में हुई इस कार्रवाई के दौरान राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया गया, जबकि सौ से अधिक स्थानीय नागरिकों की मौत हो गई। इस सैन्य हस्तक्षेप को ट्रंप प्रशासन की तथाकथित “नई मोनरो सिद्धांत” नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें सैन्य ताकत के बल पर संसाधनों पर कब्ज़ा और “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर प्रभाव विस्तार को सही ठहराया जा रहा है।
वेनेज़ुएला पर सैन्य हमले के बाद ट्रंप ने घोषणा की कि “पश्चिमी गोलार्ध हमारा गोलार्ध है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है और उनकी अपनी इच्छाशक्ति ही सैन्य कार्रवाइयों की एकमात्र सीमा है।
अंतर्राष्ट्रीय नियमों की अनदेखी करने वाली ऐसी टिप्पणियां वर्ष 1823 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मोनरो के बताए उस सिद्धांत (“अमेरिका अमेरिकियों का अमेरिका है”) के बिल्कुल उलट है। मोनरो सिद्धांत का असली मकसद यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार का विरोध करना था, जिसे अब ट्रंप ने तोड़-मरोड़कर पश्चिमी गोलार्ध में अपने हितों पर कब्ज़ा करने के लिए अमेरिका के लिए एक टूल बना दिया है। वर्ष 2025 के अंत में, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति रिपोर्ट में पहली बार “मोनरो सिद्धांत से ट्रंप का नया निष्कर्ष” शामिल किया गया, जो वेनेजुएला के खिलाफ इस बार के हमले के लिए एक थ्योसैद्धांतिक आधार देता है।
वेनेजुएला के खिलाफ हमला करने के बाद, ट्रंप ने तुरंत ही घोषणा की कि 3 करोड़ से 5 करोड़ बैरल वेनेज़ुएला के तेल को अमेरिका के लिये “स्थानांतरण” किया जाएगा, जिसके संबंधित फंड की देखरेख ट्रंप करेंगे। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने आगे कहा कि अमेरिका वेनेज़ुएला की तेल बिक्री का “अनिश्चितकालीन पर्यवेक्षण व प्रबंधन” करेगा। दूसरे देशों के संसाधन हड़पने की यह कार्यवाही अमेरिका में नए मोनरो सिद्धांत के असली रूप को सामने लाता है कि अमेरिका सैन्य तरीकों से रणनीतिक संसाधनों का नियंत्रण करने और दुनिया भर में अपनी बादशाहत मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का नज़रिया सीधा और खतरनाक है। उनका मानना है कि कानून के बजाय देश की ताकत को अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों का नतीजा तय करना चाहिए।
ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है, जिसे बहुत उच्च स्तरीय स्वायत्तता मिली हुई है। ग्रीनलैंड के दुर्लभ पृथ्वी और ग्रेफाइट आदि संसाधन ऊर्जा संक्रमण और चिप निर्माण के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ट्रंप ने बार-बार दावा किया है कि अमेरिका को “ग्रीनलैंड की ज़रूरत है”। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी कि अमेरिका “किसी भी तरह से ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेगा”। डेनिश संसद की रक्षा समिति के अध्यक्ष रासमस जारलोव ने इस बात की आलोचना करते हुए इसे “आधुनिक इतिहास की सबसे नाजायज़ ज़मीन की मांग” बताया और चेतावनी दी कि अगर टकराव शुरू हो, तो यह “इतिहास का सबसे बेवकूफी भरा युद्ध” होगा। ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन और जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों के प्रमुख नेताओं ने इस पर अपनी बात रखी है और अमेरिका की संबंधित “धमकी भरी बातों” की कड़ी आलोचना की है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के वीटो से नाटो का “सामूहिक रक्षा खंड” बेकार हो जाएगा। यूरोपीय देश सैन्य और आर्थिक रूप से अमेरिका पर इतना ज़्यादा निर्भर है कि वे अमेरिका से असली ब्रेक नहीं ले सकते। अपने यूरोपीय साथियों का सतर्क रवैया अमेरिका के दबदबे वाले दबाव को आगे दिखाता है।
ट्रंप की महत्वाकांक्षा के पीछे अमेरिकी टेक अमीरों की शह और समर्थन रखते हैं। ग्रीनलैंड के संसाधनों का इस्तेमाल करके डेटा केंद्र बनाने की कोशिश करने के लिये, मार्क ज़ुकेरबर्ग और जेफ बेज़ोस आदि सिलिकॉन वैली के अमीरों ने न केवल ग्रीनलैंड की माइनिंग कंपनियों में निवेश किया है, बल्कि ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति अभियान का समर्थन किया है। राजनेताओं और व्यापारियों के बीच यह मिलीभगत अमेरिकी लालच के गहरे इरादों को सामने लाती है कि वे रणनीतिक संसाधनों को नियंत्रित करके अपनी दबदबा बनाए रखते हैं और साथ ही अति-अमीरों के लिए भारी मुनाफ़े की तलाश करते हैं।
ट्रंप ने मीडिया से कहा कि अमेरिका के वेनेजुएला दखल देने वाला आखिरी देश नहीं हो सकता। उन्होंने कोलंबिया, क्यूबा, ईरान और मैक्सिको आदि देशों को भी धमकियां दीं। ट्रंप का कहना है कि पश्चिमी गोलार्ध ‘हमारा गोलार्ध’ है। उन्होंने आगे कहा कि मोनरो सिद्धांत ज़रूरी है और कई अमेरिकी राष्ट्रपतियां इसे भूल गए हैं। लेकिन “मैं नहीं भूला”।
अमेरिका के लालच की कोई सीमा नहीं है और दुनिया को अमेरिका के इस नए मोनरो सिद्धांत से सावधान रहना चाहिए। अमेरिका सरकार के शब्द व काम न केवल वेनेजुएला व ग्रीनलैंड जैसे देशों एवं क्षेत्रों के लिए खतरा हैं, बल्कि सारी दुनिया में शांति और स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आधिपत्यवाद का विरोध करने और अंतर्राष्ट्रीय कानून व अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों को बनाए रखने के लिए एकजुट होना चाहिए। इससे वे यह पक्का कर सकते हैं कि दुनिया शांति और विकास के सही रास्ते पर आगे बढ़े।
(साभार – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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