हाल ही में चीन ने कानून के तहत जापान को दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं के निर्यात नियंत्रण को और कड़ा कर दिया है। इसके प्रत्युत्तर में जापान ने चीन पर “आर्थिक दबाव” डालने का आरोप लगाते हुए इस कदम का विरोध किया और इन उपायों को वापस लेने की मांग की है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि चीन इस प्रकार के आरोपों का “कड़ा विरोध करता है और उन्हें स्वीकार नहीं करेगा”। चीनी मंत्रालय ने जोर दिया कि चीन का यह कदम किसी भी तरह से “दबाव” नहीं, बल्कि जापान की बढ़ती खतरनाक गतिविधियों के मद्देनज़र उठाया गया एक वैध, उचित और आवश्यक कदम है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा की रक्षा के चीन के दायित्व के अनुरूप है।
“दोहरे उपयोग वाली वस्तुएँ” वे वस्तुएँ, प्रौद्योगिकियाँ और संबंधित सामग्रियाँ हैं, जिनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है तथा जो भारी विनाश के हथियारों के विकास में योगदान दे सकती हैं। चीन के सख्त निर्यात नियंत्रण का कारण साने ताकाइची सरकार द्वारा सत्ता में आने के बाद से उठाए गए कई खतरनाक और उकसाने वाले कदम हैं- जैसे चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप, बल प्रयोग की धमकियाँ, “तीन सुरक्षा दस्तावेज़ों” में संशोधन का दबाव, तथा सहयोगी देशों द्वारा परमाणु हथियारों के समर्थन में दिए गए सार्वजनिक बयान। ये सभी कार्रवाइयाँ जापान की शांतिवादी संविधान की सीमाओं से मुक्त होने और “पुनः सैन्यीकरण” की दिशा में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा को उजागर करती हैं, जो न केवल क्षेत्रीय शांति बल्कि समग्र स्थिरता के लिए भी गंभीर खतरा हैं।
इसी पृष्ठभूमि में चीन ने जापान की सेना और उससे जुड़े उद्देश्यों के लिए दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। इस कदम का उद्देश्य जापान की “पुनः सैन्यीकरण” की प्रवृत्तियों और संभावित परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकना है। चीन का यह उपाय न केवल “निर्यात नियंत्रण अधिनियम” के तहत उसके घरेलू कानूनी दायित्वों को पूरा करता है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय हथियार अप्रसार जिम्मेदारियों का भी पालन करता है। इससे जापान को अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकियों तक अवैध पहुँच से रोका जा सकेगा और उसके सैन्य विस्तार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।
जापान के हालिया कदमों ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चिंता पैदा कर दी है। वित्त वर्ष 2026 के लिए जापान का रक्षा बजट 90 खरब जापानी येन से अधिक पहुँच गया है जो लगातार 14वें वर्ष वृद्धि दर्शाता है और इसमें लंबी दूरी के मारक हथियारों के विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। यह रुख जापान के “केवल रक्षात्मक सुरक्षा” के सिद्धांत से स्पष्ट विचलन को दर्शाता है।
इसके अलावा, जापान “तीन सुरक्षा दस्तावेज़ों” में संशोधन करने की योजना बना रहा है, ताकि वह “प्रति-हमला क्षमता” हासिल कर सके, हथियार निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे सके और “तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों” पर पुनर्विचार कर सके। उल्लेखनीय है कि जापान के पास वर्तमान में 47 टन पृथक प्लूटोनियम है, जो लगभग 6,000 परमाणु वारहेड बनाने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, जापान के वरिष्ठ अधिकारी खुले तौर पर परमाणु हथियारों की वकालत कर रहे हैं और तथाकथित “परमाणु साझेदारी” की अवधारणा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे पूरा क्षेत्र परमाणु संकट के कगार पर पहुँच रहा है।
चीन के ये उपाय द्वितीय विश्व युद्ध में मिली जीत की उपलब्धियों की रक्षा करने और एशिया में दीर्घकालिक शांति बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। जापान द्वारा अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी करते हुए चीन पर झूठे आरोप लगाना उसके भीतर पनप रहे सैन्यवाद के पुनरुत्थान को और उजागर करता है। यही स्थिति चीन के कदमों की वैधता और आवश्यकता को और अधिक रेखांकित करती है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जापान की इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए एकजुट होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को जापान में परमाणु सामग्रियों के निरीक्षण को और सख़्त करना होगा। साथ ही, संबंधित देशों को जापान के साथ अपने सैन्य सहयोग पर पुनर्विचार करना चाहिए और क्षेत्र में स्थायी शांति तथा सार्वभौमिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सैन्यवाद के पुनरुत्थान के विरुद्ध एक मज़बूत सामूहिक रक्षा तंत्र का निर्माण करना चाहिए।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)