अमेरिका के साथ हालिया व्यापार समझौते के बाद भारत का व्यापार अधिशेष सालाना 90 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। गुरुवार को जारी एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते से भारत को हर साल कम से कम 45 अरब डॉलर का अतिरिक्त लाभ हो सकता है, जो देश की जीडीपी का करीब 1.1 प्रतिशत है। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 3 अरब डॉलर की बचत का अनुमान है।
एसबीआई के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा कि शुरुआती आकलन के अनुसार भारतीय निर्यातक एक साल में शीर्ष 15 उत्पादों का निर्यात अमेरिका को 97 अरब डॉलर तक बढ़ा सकते हैं। अन्य उत्पादों को मिलाकर यह आंकड़ा 100 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। वहीं अमेरिका से भारत में हर साल 50 अरब डॉलर से ज्यादा का आयात होने की संभावना है (सेवाओं को छोड़कर)।
रिपोर्ट में बताया गया कि वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 40.9 अरब डॉलर था। वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-दिसंबर) में यह 26 अरब डॉलर रहा, लेकिन आने वाले समय में इसके 90 अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की संभावना है।
बांग्लादेश समझौते का असर?
रिपोर्ट में अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते का भी जिक्र है। अमेरिका भारत और बांग्लादेश दोनों से लगभग 7.5 अरब डॉलर का कपड़ा आयात करता है, हालांकि उत्पादों की प्रकृति अलग है। हाल ही में अमेरिका ने बांग्लादेशी सामान पर टैरिफ घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया है और कुछ शर्तों के तहत शून्य टैरिफ का प्रावधान भी रखा है।
इससे भारतीय कपड़ा निर्यातकों पर असर की आशंका जताई गई, लेकिन एसबीआई की रिपोर्ट का कहना है कि अमेरिका से कच्चा माल आयात करना बांग्लादेश के लिए महंगा पड़ेगा, जिससे भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता कमजोर नहीं होगी। अगर भारत के कपास और मानव निर्मित फाइबर निर्यात का कुछ हिस्सा प्रभावित भी होता है, तो संभावित नुकसान करीब 1 अरब डॉलर तक सीमित रह सकता है।
यूरोप समझौते से बड़ा अवसर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूरोप के साथ हुए हालिया समझौते से भारत को 260 अरब डॉलर के कपड़ा बाजार में बिना शुल्क प्रवेश का मौका मिला है, जिससे भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को बड़ा लाभ मिल सकता है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और यूरोप के साथ हुए समझौते भारत को वैश्विक व्यापार में एक मजबूत और रणनीतिक स्थिति में ला सकते हैं।
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