
एंटरटेनमेंट डेस्क (फरीद शेख): Anubhav Sinha एक बार फिर सामाजिक मुद्दे पर आधारित फिल्म लेकर आए हैं। ‘Aasi’ की शुरुआत एक बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय गैंगरेप से होती है। निर्देशक का इरादा साफ़ है कि वह दर्शकों को झकझोरना चाहते हैं, और इस कोशिश के लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। अनुभव सिन्हा ने कोर्टरूम ड्रामा और सामाजिक सवालों को जोड़ने का साहसिक प्रयास किया है, जो काबिल-ए-तारीफ़ है।
कहानी Gaurav Solanki ने लिखी है। विषय मजबूत है, लेकिन पटकथा कहीं-कहीं भटकती नज़र आती है। फिल्म एक जटिल भूलभुलैया जैसी बन जाती है, जहां से निकलने का रास्ता साफ़ नहीं दिखता। फिर भी, निर्देशक का प्रयास और उनकी सोच फिल्म को महत्व देती है।
फिल्म में Zeeshan Shaikh जैसे अच्छे कलाकार को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया गया है। उनका किरदार काफी सीमित और लगभग खामोश ही रखा गया है।
सपोर्टिंग कास्ट में
Naseeruddin Shah,
Manoj Pahwa,
Supriya Pathak,
Kumud Mishra
और Revathi जैसे दमदार कलाकार मौजूद हैं, लेकिन उनके किरदारों को ज्यादा गहराई नहीं मिल पाती। इनमें सबसे प्रभावशाली काम Revathi का है, जो जज के रूप में संतुलित और विश्वसनीय लगती हैं।

अब बात लीड रोल की। Taapsee Pannu
Taapsee Pannu फिल्म में ‘Raavi’ नाम की वकील बनकर पीड़िता को इंसाफ दिलाने की जंग लड़ती नजर आती हैं, लेकिन उनका परफॉर्मेंस एक ही सुर में अटक कर रह जाता है-
रावी वाला किरदार एक वकील के रूप में कमजोर लगता है। उसे बहुत ज्यादा इमोशनल दिखाया गया है, जबकि एक वकील को केस लड़ते समय कॉन्फिडेंस और तेज दिमाग दिखाना चाहिए। इससे उसका किरदार असली वकील जैसा नहीं लगता।
तापसी की एक्टिंग उनका एक्सप्रेशन एक जैसा लगता है, जिससे किरदारों में वैरायटी कम महसूस होती है। सीन में कई बार ओवरएक्टिंग महसूस होती है, जिससे सीन का असर नेचुरल की जगह ड्रामेटिक ज़्यादा हो जाता है। “इस फिल्म में” जैसे गंभीर माहौल में यह ओवरड्रामा जैसा लगता है। रावी का रोल एक मजबूत वकील बनने की जगह एक ज्यादा भावुक इंसान बनकर रह गया है। अगर उसे ज्यादा स्मार्ट और कॉन्फिडेंट दिखाया जाता, तो कहानी ज्यादा असरदार होती।
कोर्टरूम सीक्वेंस में उनकी डायलॉग डिलीवरी कई जगह ओवरएक्टिंग की हद छूती है, जिससे सीन की गंभीरता असर छोड़ने के बजाय बनावटी लगने लगती है। भावनाओं की आग में किरदार की तर्कशक्ति और प्रोफेशनल ठंडक कहीं दब जाती है। नतीजा यह कि ‘Raavi’ एक दमदार, शेरदिल वकील कम और हर सीन में भावनात्मक विस्फोट करती हुई महिला ज़्यादा लगती है, जिससे किरदार का वजन और विश्वसनीयता दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।

पीड़िता के रोल में Kani Kusruti नजर आती हैं, लेकिन उनका किरदार सिर्फ़ एक victim बनकर रह जाता है। उनके दर्द को गहराई से उभारने की कोशिश कम दिखाई देती है। फिल्म एक गंभीर अपराध से शुरू होती है, लेकिन आगे चलकर न तो पीड़िता के दर्द को प्रभावी ढंग से दिखा पाती है और न ही कानूनी लड़ाई को दमदार बना पाती है। पूरी फिल्म बिखरी हुई सी महसूस होती है।
इसके बावजूद, निर्देशक अनुभव सिन्हा की नीयत और सामाजिक सोच काबिल-ए-तारीफ़ है। वह लगातार ऐसे विषय उठा रहे हैं जिन पर बात करना ज़रूरी है। शायद उन्हें अगली फिल्म में कहानी को और कसावट देने की ज़रूरत है। फिल्म देखने के बाद मन भारी हो जाता है और सच कहें तो दो कप स्ट्रॉन्ग चाय की ज़रूरत महसूस होती है।
‘Aasi’ एक जरूरी मुद्दे पर बनी फिल्म है, लेकिन कमजोर पटकथा और असंतुलित अभिनय इसे असरदार बनने से रोक देता है।“दैनिक सवेरा टाइम्स न्यूज़ मीडिया नेटवर्क इस फिल्म को 2 स्टार रेटिंग देता है।”
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