Last Updated: September 21, 2026

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2300km की दूरी से इजराइल-ईरान में जंग, जानें दोनों देशों के पास कितनी ताकतवर मिसाइलें

February 28, 2026

2300km की दूरी से इजराइल-ईरान में जंग, जानें दोनों देशों के पास कितनी ताकतवर मिसाइलें

इंटरनेशनल डेस्क: इजराइल ने ईरान के कई शहरों पर हवाई हमले किए, जिससे पूरे देश में सयारन बज रहे हैं। पिछले एक महीने से अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump की ओर से ईरान को कड़ी चेतावनियां दी जा रही थीं। इसी बीच इजराइल की कार्रवाई के बाद ईरान ने भी जवाबी हमला करने का दावा किया है।

दोनों देशों के बीच सीधी जमीनी सीमा नहीं है और इनके बीच करीब 2100 से 2300 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में आमने-सामने की जमीनी लड़ाई संभव नहीं मानी जाती। इस कारण संघर्ष का मुख्य आधार मिसाइलें, लड़ाकू विमान और ड्रोन बनते हैं। वहीं अमेरिका ने पर्शियन गल्फ और अरब सागर क्षेत्र में अपने नौसैनिक बेड़े भी तैनात कर रखे हैं, जिससे हालात और संवेदनशील हो गए हैं।

ईरान की मिसाइल ताकत

इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने अपने रक्षा कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया। चीन और उत्तर कोरिया की तकनीकी मदद से उसने बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का विकास किया। आज ईरान के पास मध्यम और लंबी दूरी तक मार करने वाली कई मिसाइलें हैं। ईरान की ‘सेजिल’ मिसाइल लगभग 2500 किलोमीटर तक मार कर सकती है और इसकी रफ्तार बहुत तेज बताई जाती है। इसके अलावा ‘शहाब-3’, ‘इमाद’ और ‘खेबर’ जैसी मिसाइलों की रेंज भी करीब 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है। इनमें से कई मिसाइलों को अपग्रेड कर उनकी क्षमता बढ़ाई गई है।

‘शहाब-3’ को ईरान की मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों का आधार माना जाता है। यह तरल ईंधन से चलती है और भारी पेलोड ले जाने में सक्षम है। इसके नए संस्करण ‘गदर’ और ‘एमाद’ भी चर्चा में रहे हैं। हाल के वर्षों में ईरान ने ‘फतह-1’ नाम की मिसाइल पेश की, जिसे हाइपरसोनिक क्षमता वाली बताया गया है। ऐसी मिसाइलें ध्वनि की गति से कई गुना तेज चल सकती हैं और आधुनिक रक्षा प्रणालियों को चुनौती देने में सक्षम मानी जाती हैं।

इसके अलावा ‘खोर्रमशहर-4’ जैसी बैलिस्टिक मिसाइल भी ईरान के बेड़े में शामिल है, जिसकी रेंज लगभग 2000 किलोमीटर बताई जाती है। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान के पास हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं। ‘फतह-110’, ‘जोल्फघर’ और ‘हज कासिम’ जैसे सिस्टम भी उसकी ताकत बढ़ाते हैं। ईरान के पास क्रूज मिसाइलें भी हैं, जिनमें कुछ लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं और भारी वारहेड ले जाने में सक्षम बताई जाती हैं।

इजराइल की सैन्य क्षमता

दूसरी ओर Israel के पास भी उन्नत मिसाइल और रक्षा प्रणाली है। अमेरिका में डिजाइन की गई ‘हार्पून’ एंटी-शिप मिसाइल उसके बेड़े का हिस्सा है। इसके अलावा इजराइल ने ‘लोरा’ नाम की कम दूरी की मिसाइल भी विकसित की है। ‘जेरिको-1’, ‘जेरिको-2’ और ‘जेरिको-3’ जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें भी इजराइल की सामरिक ताकत मानी जाती हैं। हालिया हमलों में ‘पोपेये’ मिसाइल का नाम सबसे ज्यादा सामने आया। यह एक एयर-टू-सर्फेस मिसाइल है, जिसे लड़ाकू विमान से दागा जाता है और यह सटीक निशाने के लिए जानी जाती है।

इजराइल की पहचान उसकी मजबूत मिसाइल रोधी प्रणाली से भी है। ‘आयरन डोम’ और ‘ऐरो’ जैसे एंटी-मिसाइल सिस्टम दुनिया भर में चर्चित हैं। ये सिस्टम दुश्मन की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।

अमेरिका की भूमिका

United States लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा है। इजराइल को सैन्य सहायता देने में अमेरिका सबसे आगे है। अगर दोनों देशों के बीच बड़ा युद्ध होता है, तो अमेरिका के इजराइल के साथ खड़े होने की संभावना मजबूत मानी जाती है। ईरान तक पहुंचने के लिए इजराइल को इराक और जॉर्डन के हवाई क्षेत्र से गुजरना पड़ता है। ऐसे में क्षेत्रीय देशों की भूमिका भी अहम हो जाती है। जॉर्डन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किसी हमले के लिए नहीं होने देगा।

किन देशों का झुकाव किस ओर?

ईरान को तुर्किए, सऊदी अरब, यूएई और मिस्र जैसे देशों से समर्थन मिलने की संभावना पर भी चर्चा होती रहती है, हालांकि इन देशों के अमेरिका से संबंधों के कारण उनकी स्थिति संतुलित भी रह सकती है। वहीं चीन, रूस और उत्तर कोरिया को ईरान के सैन्य कार्यक्रम में तकनीकी और रणनीतिक सहयोगी माना जाता है। इन तीनों देशों के अमेरिका से रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, इसलिए क्षेत्रीय टकराव की स्थिति में वैश्विक राजनीति भी प्रभावित हो सकती है।

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