
इंटरनेशनल डेस्क : मध्य पूर्व इन दिनों युद्ध के उस भयावह मंजर का गवाह बन रहा है, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने की खबर है, जिसने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। इज़राइली मीडिया के अनुसार, इस्राएली वायुसेना ने ईरान के पश्चिमी और मध्य भागों में लगभग 500 सैन्य लक्ष्यों पर हवाई हमले किए, जो इज़राइल की सेना के इतिहास का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्य अभियान बताया जा रहा है। इस हमले के उत्तर में ईरान ने मध्य पूर्व के कई सैन्य अड्डों और इज़राइल के भीतर कुछ लक्ष्यों पर मिसाइल और ड्रोन दागे। न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार ईरान की राजधानी तेहरान में बड़े पैमाने पर विस्फोट सुने गए और सैकड़ों लोग घायल हुए, कई स्कूल भी प्रभावित हुए।
इस साहसिक हमले के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने भी करारा जवाब दिया। ईरानी सेना ने मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया और इजरायल पर भी कई मिसाइलें दागीं। इस जवाबी कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है, और एक बड़े युद्ध की आशंका पैदा हो गई है।
मध्य पूर्व पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता, सुरक्षा संकट और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। ऐसे में किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का असर सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ता है। तेल आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर संभावित खतरे से विश्व अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर विकासशील देशों पर सबसे अधिक पड़ने की आशंका रहती है।
इस घटनाक्रम के बाद संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों ने संयम बरतने और संवाद बहाल करने की अपील की है। वैश्विक समुदाय का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि सैन्य समाधान स्थायी शांति का मार्ग नहीं बन सकता। इतिहास बताता है कि मध्य पूर्व में लंबे समय तक चले संघर्षों ने केवल अस्थिरता, मानवीय संकट और अविश्वास को ही बढ़ाया है।
इसी संदर्भ में चीन द्वारा तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने, तनाव कम करने और वार्ता के माध्यम से समाधान खोजने की अपील महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देना ही वर्तमान परिस्थिति में सबसे व्यावहारिक विकल्प प्रतीत होता है, क्योंकि किसी भी बड़े युद्ध का प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा। चीन ने सभी पक्षों से संयम बरतने, सैन्य गतिविधियों को तुरंत रोकने तथा वार्ता और बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने का आग्रह किया है। चीन ने कहा कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।
विश्लेषकों के अनुसार इस घटना से न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाज़ार पर भी लंबे समय तक गहरा प्रभाव पड़ सकता है। मध्य पूर्व और विश्व — दोनों के हित में यही है कि टकराव की जगह बातचीत को चुना जाए, क्योंकि अंततः शांति ही किसी भी क्षेत्र की स्थिरता और विकास की आधारशिला होती है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)
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