Last Updated: September 21, 2026

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मध्य पूर्व संकट का असर, कच्चे तेल की कीमत 83 डॉलर के पार

March 5, 2026

मध्य पूर्व संकट का असर, कच्चे तेल की कीमत 83 डॉलर के पार

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच गुरुवार को कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई। सप्लाई पर असर पड़ने के कारण कीमतों में उछाल आया है, क्योंकि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) को बंद कर दिया है।

सुबह के शुरुआती कारोबार में इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर बेंचमार्क क्रूड का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.43 प्रतिशत बढ़कर 83.26 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।

वहीं न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (एनवाईमेक्स) पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.63 प्रतिशत बढ़कर 76.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक कंटेनर जहाज पर प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिससे जहाज को नुकसान पहुंचा है।

तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी भारत के आयात बिल पर असर डाल सकती है। यदि कच्चे तेल की कीमत पूरे साल के लिए प्रति बैरल 1 डॉलर बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल लगभग 16,000 करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है।

इस बीच, सरकारी सूत्रों के मुताबिक, कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी को लेकर भारत फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में है। देश के पास लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल का भंडार और 25 दिनों के पेट्रोलियम उत्पादों का स्टॉक मौजूद है, जिसमें वह तेल भी शामिल है जो जहाजों के जरिए भारत के बंदरगाहों की ओर आ रहा है।

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, जिसमें से करीब 50 प्रतिशत तेल मिडिल ईस्ट के देशों से आता है, जो मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। ईरान युद्ध के बाद इस मार्ग से सप्लाई प्रभावित हुई है।

हालांकि, भारत ने अफ्रीका, रूस और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता लाई है और रणनीतिक भंडार बनाकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने खाड़ी देशों के अलावा अन्य देशों से भी तेल आयात बढ़ाया है, जिसके चलते अब बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते नहीं आती।

भारत ने 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) के दौरान 206.3 मिलियन टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च किए गए।

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