Drone technology: जब मैं खबरों में देखती हूं कि ड्रोन मध्य पूर्वी देशों के शहरों पर बम गिरा रहे हैं, जिससे आम लोग मारे जा रहे हैं और घर बर्बाद हो रहे हैं, तो मेरा मन दुःखी हो जाता है। मुझे बचपन से सिखाया गया है कि तकनीक इंसानी दिमाग की बनाई चीज है, इससे अच्छे काम करने चाहिए, दर्द नहीं देना चाहिए। लेकिन आज एक ही तकनीक – ड्रोन – दुनिया के अलग-अलग कोनों में बिल्कुल अलग भूमिका निभा रही है।
चीन में, ड्रोन को अक्सर “डिलीवरी ड्रोन”, “कृषि ड्रोन”, “बचाव ड्रोन” आदि से जोड़कर देखा जाता है, न कि “हमलावर ड्रोन” से। इसके पीछे एक गहरा सांस्कृतिक चुनाव है: तकनीक का उपयोग जीवन को सशक्त बनाने के लिए, न कि उसे समाप्त करने के लिए। आज का चीन, जहां ड्रोन धीरे-धीरे लोगों के जीवन को बदल रहे हैं:
डिलीवरी व्यक्तियों का “हवाई सहायक”
दक्षिण चीन के क्वांगतोंग प्रांत के शनचन शहर में, ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच ड्रोन गर्मागर्म कॉफी और स्वादिष्ट भोजन समय पर कार्यालयों तक पहुंचाते हुए आते-जाते दिखाई देते हैं। इन्हें स्मार्ट सिस्टम चलाता है, हर ऑर्डर 15 मिनट में पहुंच जाता है। वह डिलीवरी वाला जिसे पहले 100 किमी. दौड़ना पड़ता था, अब बुजुर्गों की सेवा पर ध्यान दे सकता है, क्योंकि दूर के ऑर्डर ड्रोन पहुंचा देते हैं। तकनीक ने इंसान की जगह नहीं ली, बल्कि उसे आराम दिया।
किसानों का “खेत रक्षक”
दक्षिण पूर्वी चीन के च्यांगशी प्रांत में धान के खेतों के ऊपर ड्रोन सही मात्रा में दवाई छिड़कते हैं। पहले एक एकड़ में छिड़काव पर 13-20 युआन खर्च होते थे, अब ड्रोन से सिर्फ 1-2 युआन लगते हैं, और किसान जहरीले केमिकल से भी बच जाते हैं। किसान सिर्फ टैबलेट से ड्रोन का रास्ता तय करते हैं, जैसे कोई गेम खेल रहे हों। तकनीक ने प्रदूषण नहीं फैलाया, बल्कि जमीन और जिंदगी की रक्षा की।
फायरफाइटर का “हवाई साथी”
पिछले साल, क्वांगतोंग प्रांत की राजधानी क्वांगचो में ऊंची इमारत की आग बुझाने का अभ्यास किया गया, जिसमें ड्रोन सबसे पहले आसमान में गए, उन्होंने आग बुझाने वाले गोले गिराए और गर्मी से पहचानने वाले कैमरों से फंसे लोगों का पता लगाया। अगर ड्रोन न होते, तो फायरफाइटर्स को तीन गुना ज्यादा खतरा उठाना पड़ता। तकनीक ने खतरा नहीं बढ़ाया, बल्कि खतरे को कम किया।
कम्यूटर की “उड़ने वाली कार”
क्वांगचो शहर में ही अपने-आप चलने वाली उड़ने सक्षम कारों का टेस्ट भी चल रहा है। जिस व्यक्ति को पहले ऑफिस आने-जाने में 3 घंटे लगते थे, अब उड़ने वाली कार से वह दूसरे शहर सिर्फ 1 घंटे में पहुंच सकता है। इस तरह हर दिन परिवार के साथ 2 घंटे ज्यादा बिताने को मिल रहे हैं। तकनीक ने ट्रैफिक नहीं बढ़ाया, बल्कि समय बचाया।
चीन ने तकनीक का यह रास्ता क्यों चुना? यह कोई संयोग नहीं है। हम तकनीक को हमेशा “इंसान की जरूरत” के इर्द-गिर्द विकसित करते हैं। इन दिनों, चीन की राजधानी पेइचिंग में एनपीसी और सीपीपीसीसी के वार्षिक सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। इस दौरान पेश की गई “सरकारी कार्य रिपोर्ट” में लगातार तीसरे वर्ष “लो अल्टीट्यूड इकोनॉमी” (निम्न-ऊंचाई अर्थव्यवस्था) को प्रमुख स्थान दिया गया, जिसमें ड्रोन को पार्सल, खेती और बचाव जैसे कामों में प्राथमिकता दी गई है। DJI, EHang जैसी कंपनियों ने “तकनीक सबके लिए” को अपना मकसद बनाया है – उनकी टीमें गांवों और पहाड़ों में जाकर सोचती हैं कि आम लोगों की समस्याएं तकनीक से कैसे सुलझें। चीन की सोशल मीडिया पर ड्रोन से ली गई खूबसूरत तस्वीरों और ड्रोन प्रदर्शन को करोड़ों लाइक मिलते हैं, जबकि सैन्य ड्रोन पर बहुत कम बात होती है – यह जनता का चुनाव है।
तकनीक जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाती है। यह विकल्प करना जरूरी है: क्या हम तकनीक का उपयोग शांति के पुल बनाने के लिए करते हैं, या अलगाव की ऊंची दीवारें खड़ी करने के लिए? क्या हम तकनीक का उपयोग भोजन और सामग्री पहुंचाने के लिए करते हैं, या बम और विस्फोटक गिराने के लिए? ड्रोन की कोई इच्छा नहीं होती, यह सिर्फ एक दर्पण है, जो उपयोगकर्ता की सोच दर्शाता है।
चीन की तरह, भारत भी ड्रोन तकनीक का तेजी से उपयोग कर रहा है। भारत में भी, ड्रोन धीरे-धीरे लोगों के जीवन को बदल रहे हैं, न कि आतंक पैदा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कृषि के क्षेत्र में कीटनाशक छिड़काव, फसल बोने आदि के लिए ड्रोन काम में आ रहे हैं। इससे न केवल समय की बचत हो रही है, बल्कि सही ढंग से पैदावार होने में मदद मिल रही है। पिछले साल, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला कृषि कार्यकर्ताओं की खेत के काम में सहायता के लिए एक हजार से अधिक ड्रोन वितरित किए।
साथ ही, मेडिकल फील्ड में भी ड्रोन का उपयोग हो रहा है। हाल में उत्तर-पूर्वी भारत के मेघालय में इस दिशा में बड़ी शुरूआत हुई है। यहां ड्रोन के जरिए दवाएं दूर-दराज के क्षेत्रों में पहुंच रही हैं। जाहिर है कि ड्रोन पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में तेज गति से दवा पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। जबकि हाल ही में गुरुग्राम में भी ड्रोन के जरिए फूड डिलीवरी हो रही है। वहीं ड्रोन से आग बुझाने का काम भी शुरू हो रहा है। भारत में गरुड़ा एयरोस्पेस कंपनी जैसी कुछ कंपनियां ड्रोन बना रही है। कहा जा सकता है कि भारत ड्रोन का इस्तेमाल शांति और जीवन संबंधी जरूरतों के लिए भी कर रहा है।
तकनीक की सबसे ऊंची मंजिल है खूबसूरती और अच्छाई की रचना करना। आइए, हम इसी मकसद पर वापस लौटें: ड्रोन से खाना पहुंचाएं, दवाई पहुंचाएं, उम्मीद पहुंचाने दें, न कि मौत। क्योंकि हर ड्रोन का रास्ता आखिरकार उस भविष्य की तरफ जाता है, जो हम खुद चुनते हैं।
(मीरा चू, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)