Hukamnama 27 March 2026: सलोक मः २ ॥ अंधे कै राहि दसिऐ अंधा होइ सु जाइ ॥ होइ सुजाखा नानका सो किउ उझड़ि पाइ ॥ अंधे एहि न आखीअनि जिन मुखि लोइण नाहि ॥ अंधे सेई नानका खसमहु घुथे जाहि ॥१॥मः २ ॥ साहिबि अंधा जो कीआ करे सुजाखा होइ ॥ जेहा जाणै तेहो वरतै जे सउ आखै कोइ ॥ जिथै सु वसतु न जापई आपे वरतउ जाणि ॥ नानक गाहकु किउ लए सकै न वसतु पछाणि ॥२॥मः २ ॥ सो किउ अंधा आखीऐ जि हुकमहु अंधा होइ ॥ नानक हुकमु न बुझई अंधा कहीऐ सोइ ॥३॥पउड़ी ॥ काइआ अंदरि गड़ु कोटु है सभि दिसंतर देसा ॥ आपे ताड़ी लाईअनु सभ महि परवेसा ॥ आपे स्रिसटि साजीअनु आपि गुपतु रखेसा ॥ गुर सेवा ते जाणिआ सचु परगटीएसा ॥ सभु किछु सचो सचु है गुरि सोझी पाई ॥१६॥
Hukamnama 27 March 2026 अर्थ: अगर कोई अंधा मनुष्य (किसी और को) राह बताए तो (उस राह पर) वही चलता है जो खुद अंधा हो; हे नानक! आँख वाला मनुष्य (अंधे के कहने पर) गलत राह पर नहीं पड़ता। (पर आत्मिक जीवन में) ऐसे लोगों को अंधे नहीं कहा जाता जिनके मुँह पर आँखें नहीं हैं, हे नानक! अंधे वही हैं जो मालिक प्रभु से टूटे हुए हैं।1।जिस मनुष्य को मालिक-प्रभु ने स्वयं अंधा कर दिया है वह तब ही आँख वाला हो सकता है यदि प्रभु स्वयं (आँख वाला) बनाए, (नहीं तो, अंधा मनुष्य तो) जिस तरह की समझ रखता है उसी तरह किए जाता है चाहे उसको कोई सौ बार समझाए। जिस मनुष्य के अंदर ‘नाम’-रूप पदार्थ की समझ नहीं वहाँ अहंकार वाला व्यवहार ही समझो, (क्योंकि) हे नानक! गाहक जिस सौदे को पहचान ही नहीं सकता उसका वह वणज ही कैसे करे?।2।जो मनुष्य प्रभु की रजा में नेत्र-हीन हो गया उसको हम अंधा नहीं कहते, हे नानक! वह मनुष्य अंधा कहा जाता है जो रजा को समझता नहीं।3।मनुष्य का) शरीर के अंदर (मनुष्य का हृदय-रूप) जिस प्रभु का किला है गढ़ है वह प्रभु सारे देश-देशांतरों में मौजूद है, सारे जीवों के अंदर परवेश करके उसने खुद ही (जीवों के अंदर) समाधि (ताड़ी) लगाई हुई है (वह खुद ही जीवों के अंदर टिका हुआ है)। प्रभु ने खुद ही सृष्टि रची है और खुद ही (उस सृष्टि में उसने अपने आप को) छुपाया हुआ है। उस प्रभु की सूझ सतिगुरु के हुक्म में चलने से आती है (तब ही) सच्चा प्रभु प्रकट होता है।
है तो हर जगह सच्चा प्रभु खुद ही खुद, पर ये समझ सतिगुरु के द्वारा ही आती है।16।
मेष: दिन शुभ रहेगा...