एक तरफ जहां एशिया का पश्चिमी हिस्सा युद्ध से उपजी हिंसा से जूझ रहा है, वहीं बाकी एशिया विकास की गति से आगे बढ़ रहा है। एशिया के दावोस समझे जाने वाले बोआओ फोरम फॉर एशिया की सालाना रिपोर्ट बताती है कि एशिया के लोगों की क्रय शक्ति लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह से एशिया का वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और इसमें यह तेजी जारी रहेगी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में एशिया की जीडीपी की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी जहां 49.2 प्रतिशत रही, वहीं साल 2026 में बढ़कर यह 49.7 प्रतिशत होने जा रही है। एक तरह से कह सकते हैं कि यह हिस्सेदारी वैश्विक हिस्सेदारी की तकरीबन आधा है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में यूरोप और अमेरिका के वर्चस्व को एशिया की ओर से चुनौती मिलने वाली है। बोआओ फोरम फॉर एशिया की हालिया बैठक के नतीजे विश्व को यही संदेश देते नजर आते हैं।
एशिया की वैश्विक जीडीपी में बढ़ती भागीदारी पर जिस तरह रिपोर्ट ने प्रकाश डाला है, उससे साफ है कि प्रत्यक्ष निवेश के लिए एशिया सबसे पसंदीदा और उम्मीदभरी जगह बनी हुई है। इसके अलावा, एशिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं धीरे-धीरे “पूंजी हासिलकर्ता” की भूमिका से निकलकर “बाहर जाने वाले निवेशक” की भूमिका में आ रही है। इसकी वजह से एशिया के देश अब बाहर भी निवेश कर रहे हैं और दूसरे देशों को आर्थिक और सामाजिक मदद भी दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते तेल और गैस की आपूर्ति पर संकट तो है, इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर बोआओ फोरम फॉर एशिया की सालाना रिपोर्ट में एशिया में रोजगार की स्थिति को मौजूदा सत्र में बेहतर रहने की उम्मीद जताना भी एक तरह से एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को लेकर उम्मीद को ही जाहिर करता है। इसके बावजूद कुछ क्षेत्र ऐसे रह सकते हैं, जहां बेरोजगारी का दबाव काफी अधिक रह सकता है। इस रिपोर्ट में एशिया को चेतावनी भी दी है। इसके अनुसार कुछ देशों में व्यापार नियमों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और इस क्षेत्र बढ़ती अनिश्चितता एशिया के आर्थिक हालात के लिए चिंता की वजह हो सकती है। इसकी वजह से विशेषकर मजदूरों की आय कम हो रही है और यह स्थिति खासकर दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया में ज्यादा दिख रही है। इससे ये दोनों इलाके विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। जाहिर है कि यह रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को इस ओर ध्यान देना होगा।
बोआओ फोरम फॉर एशिया के महासचिव झांग जून का यह कहना ठीक ही है कि अनेक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, एशियाई अर्थव्यवस्था मजबूत लचीलापन प्रदर्शित करती रहती है, सकारात्मक रुझान और संभावनाएं दिखाती है, और वैश्विक अर्थव्यवस्था, वैश्विक व्यापार और सतत विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
उन्होंने कहा, “एशिया में आर्थिक एकीकरण और सतत विकास की प्रक्रिया में निश्चित रूप से कई कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ आएंगी, लेकिन जब तक सभी पक्ष आश्वस्त, एकजुट, सहयोगी और आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं, तब तक यह निश्चित रूप से एशियाई अर्थव्यवस्था के उच्च गुणवत्ता वाले विकास को बढ़ावा देगा और ‘एशियाई शताब्दी’ की ओर एक नया विकास परिदृश्य तैयार करेगा।”
बोआओ फोरम फॉर एशिया की 2026 की 24 मार्च से 27 मार्च तक चली सालाना बैठक का इस बार का केंद्रीय विषय “साझा भविष्य का निर्माण: नया संदर्भ, नए अवसर, नया सहयोग” रहा। जिसका प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना, वैश्विक चुनौतियों का समाधान करना, एशिया- प्रशांत क्षेत्र में साझेदारी को मजबूत करना, साझा विकास के लिए बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाना और खुले, समावेशी, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाले विकास को बढ़ावा देना था।
इस सम्मेलन में “एशिया और विश्व में सतत विकास पर 2026 की वार्षिक रिपोर्ट” भी आधिकारिक तौर पर जारी की गईं। दोनों रिपोर्टों और बैठक की चर्चाओं के जरिए बोआओ फोरम ने बड़े बदलावों और चुनौतियों के बीच, बहुपक्षवाद और साझेदारी के माध्यम से वैश्विक विकास को नई दिशा देने का संदेश दिया है। सम्मेलन में ठीक ही इस बात पर जोर दिया कि बदलती दुनिया में एशिया की भूमिका और आपसी सहयोग अब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
सम्मेलन में बताया गया कि डिजिटल परिवर्तन एशिया में सतत विकास के लिए एक नए इंजन के रूप में उभरा है। इसका संदेश केवल क्षेत्रीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसे समावेशी सहयोग का है जो बाहरी दुनिया के लिए भी खुला हो। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ट्रस्ट फंड की निदेशक ग्रेस वांग का कहना कि पिछले कुछ दशकों से जारी क्षेत्रीय एकीकरण और सहयोग की प्रवृत्ति आने वाले वर्षों में भी महत्वपूर्ण होगी। जिसकी वजह से सकारात्मक वैश्विक बदलाव आ सकते हैं। मौजूदा दौर में, वैश्विक जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान देने वाला एशिया-प्रशांत क्षेत्र , दुनिया के भविष्य की दिशा तय करने की क्षमता रखता है। दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग, एकजुटता और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों पर आधारित क्षेत्रीय एकीकरण को सुदृढ़ करके निरंतर वैश्विक प्रगति और स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है।
ग्रेस वांग के संदेश को भी एशिया को गंभीरता से लेना चाहिए, जो फोरम के मंच से उन्होंने दिया। उनका कहना था कि पड़ोसियों के बीच एकजुटता और क्षेत्रीय स्तर पर समन्वित विकास रणनीतियों ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के उल्लेखनीय उत्थान को आधार प्रदान किया है। साठ साल पहले, यह दुनिया का गरीब क्षेत्र था; आज, यह वैश्विक जीडीपी का लगभग आधा हिस्सा उत्पन्न करता है और “केवल दो पीढ़ियों के भीतर” 1.5 अरब लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाल चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बोआओ फोरम फॉर एशिया के संदेश को पूरी एशिया एकजुट भाव से सकारात्मक ढंग लेगा और अपनी जनता की भलाई के लिए आगे बढ़ता रहेगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक- उमेश चतुर्वेदी)