4 से 11 अप्रैल 2026 तक, थाईलैंड की महामहिम राजकुमारी महा चक्री सिरिंधोर्न ने चीनी सरकार के निमंत्रण पर चीन की अपनी 54वीं यात्रा शुरू की। देखने में साधारण लगने वाली यह संख्या “54” एक दुर्लभ कूटनीतिक घटना को दर्शाती है– एक विदेशी शाही परिवार की सदस्य ने 45 वर्षों में चीन की यात्रा को एक “कभी-कभार” होने वाली घटना से एक “अटूट” वार्षिक परंपरा में बदल दिया है। यह न केवल चीन-थाईलैंड सम्बंधों का एक अनूठा पहलू है, बल्कि अपने पड़ोसियों के साथ चीन की कूटनीति को समझने की कुंजी भी है।
राजकुमारी सिरिंधोर्न की चीन की पहली यात्रा 1981 में हुई थी। उस समय, चीन और थाईलैंड के बीच राजनयिक सम्बंध स्थापित हुए केवल छह वर्ष ही हुए थे, और चीन ने अभी-अभी दुनिया के लिए अपने द्वार खोले थे। इसके बाद चालीस से अधिक वर्षों में, उनके पदचिन्ह चीन के कोने-कोने में फैले—तटीय शहरों से लेकर पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्रों तक, विश्वविद्यालय के व्याख्यान कक्षों से लेकर ग्रामीण खेतों तक। थाईलैंड में चीन के पूर्व राजदूत फू शुएचांग, जिन्होंने उनका स्वागत किया था, ने याद किया कि राजकुमारी की यात्राएँ “एक दीर्घकालिक, व्यवस्थित परियोजना की तरह थीं”—जांच करना, ज्ञान का संचय करना, समझ को बढ़ाना और विश्वास को मजबूत करना। उन्होंने चीनी शिक्षाविद युआन लोंगपिंग से मुलाकात की और एक खेत के किनारे खाद्य सुरक्षा पर लंबी चर्चा की; उन्होंने चीनी साहित्यिक कृतियों का अनुवाद किया और लेखकों के साथ पात्रों के भाग्य का पता लगाया; उन्होंने भूकंप प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और प्राथमिक विद्यालयों के पुनर्निर्माण के लिए धन दान किया।
चीनी जनता की नज़र में, राजकुमारी सिरिंधोर्न को लगभग अद्वितीय सम्मान प्राप्त हुआ है। 2019 में, राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें “मैत्री पदक” से सम्मानित किया—जो विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के लिए चीन का सर्वोच्च सम्मान है; 2009 में, चीनी नेटिज़न्स ने उन्हें नॉर्मन बेथ्यून और एडगर स्नो के साथ “शीर्ष दस अंतर्राष्ट्रीय मित्रों” में से एक चुना। एक विदेशी शाही परिवार की सदस्य को ये सम्मान मिलना चीनी और थाई लोगों के बीच गहरे बंधन को दर्शाता है। विदेशी मीडिया ने उनकी भूमिका को “चीन-थाई सम्बंधों का आधार स्तंभ” बताया है।
राजकुमारी सिरिंधोर्न की चीन की 54 यात्राएं चीन के सुधार और खुलेपन से लेकर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने तक की पूरी प्रक्रिया की साक्षी रही हैं। उन्होंने चीन में हुए ज़बरदस्त बदलावों को प्रत्यक्ष रूप से देखा—”चीन की हर यात्रा ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी है।” यह कथन वह दशकों से कहती आ रही हैं। लेकिन “बदलाव” से भी अधिक अनमोल उनका “अपरिवर्तनशील” स्वभाव है। वह कभी व्यापार घाटे या शुल्क दरों पर चर्चा नहीं करतीं और द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर समारोहों में भी शायद ही कभी दिखाई देती हैं। उन्हें चीनी भाषा सीखना, चीनी साहित्य का अनुवाद करना, चीनी व्यंजनों पर शोध करना और चीनी बच्चों के नामकरण जैसे काम करना अधिक पसंद है। अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों पर “किसी एक पक्ष को चुनने” के दबाव के मौजूदा माहौल में, यह “गैर-उपयोगितावादी” कूटनीति अद्वितीय रणनीतिक महत्व रखती है। जहाँ कुछ देशों के राजनेताओं का चीन के प्रति रवैया उनकी घरेलू राजनीति के साथ बदलता रहता है, वहीं राजकुमारी सिरिन्धोर्न की चीन की 54 यात्राएँ अटूट रही हैं, जो चीन-थाईलैंड सम्बंधों में एक दुर्लभ निश्चितता बन गई हैं। उन्होंने जो संदेश लगातार दिया है, वह स्पष्ट और स्थिर है: थाईलैंड बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित, चीन के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंध बनाए रखना चाहता है।
राजकुमारी सिरिंधोर्न की चीन यात्राओं पर एक नज़र डालने से एक स्पष्ट दिशा उभरती है: “सीखने की यात्रा” से “मित्रता की यात्रा” की ओर, “ज्ञान के आदान-प्रदान” से “आध्यात्मिक आदान-प्रदान” की ओर, “शिष्टाचार सम्बंधों” से “रिश्तेदारी सम्बंधों” की ओर। राष्ट्रों के बीच सम्बंधों को “रिश्तेदारी” के रूप में वर्णित करना दुर्लभ है। लेकिन उन्होंने सचमुच अपना वादा निभाया—उन्होंने चीनी बच्चों से उन्हें “महामहिम” के बजाय “आंटी” कहकर पुकारने को कहा, उन्होंने अपने दल को अपने हाथ से चित्रित मंकी किंग टी-शर्ट भेंट कीं, और उन्होंने खेतों के किनारे किसानों से बातचीत की। ये संपर्क न तो लाभों का आदान-प्रदान था और न ही सत्ता संघर्ष था, बल्कि लोगों के आपस में रहने का सबसे स्वाभाविक तरीका था। जब राजकुमारी सिरिंधोर्न ने कहा, “थाईलैंड और चीन के बीच मित्रता सदा बनी रहे,” तो उनके शब्द खोखले नहीं लगे क्योंकि वे चीन की उनकी 54 यात्राओं के विवरण से पुष्ट थे।
चीन की 54 यात्राएँ, चीन की अपने पड़ोसियों के साथ कूटनीति को समझने में एक घटना से कहीं अधिक महत्व रखती हैं। यह कूटनीति में “दिल से दिल” संवाद के अद्वितीय मूल्य को दर्शाती है—आज की दुनिया में जहाँ राष्ट्रों के बीच सम्बंध तेजी से भू-राजनीति और हितों की गणना से प्रभावित हो रहे हैं, लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव एक दुर्लभ संसाधन बन गया है। राजकुमारी सिरिंधोर्न की चीन यात्राएँ 45 वर्षों से प्रासंगिक बनी हुई हैं, इसका कारण यही है कि ये भावनात्मक आधार पर टिकी थीं, न कि अल्पकालिक हितों के आदान-प्रदान पर। यह चीन और उसके पड़ोसी देशों के बीच आपसी आदान-प्रदान का एक आदर्श प्रस्तुत करती है—हर आदान-प्रदान के लिए किसी भव्य कथा की आवश्यकता नहीं होती, और न ही हर संपर्क के लिए किसी राजनीतिक एजेंडे की। “बैठकर बातचीत करना” या “साथ में पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम देखना” जैसी छोटी-छोटी संपर्क ही आपसी समझ की आधारशिला होते हैं। जैसा कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने जोर दिया, राजकुमारी सिरिंधोर्न “चीन-थाईलैंड मित्रता की एक उत्कृष्ट दूत” हैं, और “दूत” शब्द का महत्व उनके पद की ऊँचाई में नहीं, बल्कि उनकी यात्राओं की संख्या और उनके “दिल की गहराई” में निहित है।
45 वर्ष, 54 यात्राएँ, आधा जीवनकाल। राजकुमारी सिरिंधोर्न की “चीन डायरी” न केवल एक व्यक्तिगत बंधन को दर्ज करती है, बल्कि “दिल से दिल” की कूटनीतिक बुद्धिमत्ता को भी दर्शाती है। चीनी कहावत है, “रिश्तेदार जितना ज़्यादा एक-दूसरे से मिलते हैं, उतना ही करीब आते हैं”—यह “चीन और थाईलैंड एक परिवार हैं” का सबसे सरल और प्रामाणिक उदाहरण है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)