Last Updated: October 3, 2026

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मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और शांति के पक्ष में चीन की भूमिका

April 7, 2026

मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और शांति के पक्ष में चीन की भूमिका

मध्य पूर्व एक बार फिर गहरे तनाव के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती टकराहट, क्षेत्रीय संघर्षों के फैलने का खतरा, और कई देशों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी ने स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हालात ऐसे हैं कि किसी भी छोटी घटना से व्यापक युद्ध भड़क सकता है, जिसका असर सिर्फ इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

इसी जटिल परिस्थिति में चीन ने लगातार शांति और स्थिरता की वकालत की है। एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में चीन ने स्पष्ट किया है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। उसका मानना है कि संवाद और कूटनीति ही ऐसे संकटों का स्थायी समाधान दे सकते हैं। मध्य पूर्व में तनाव के अचानक बढ़ने से क्षेत्रीय देशों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चीन की संभावित भूमिका को लेकर काफी उम्मीदें जगी हैं। हाल के वर्षों में, चीन ने मध्य पूर्वी मामलों में संवाद और सुलह को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है। उल्लेखनीय उदाहरणों में ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली में सहायता करना और बीजिंग में फिलिस्तीनी राजनीतिक गुटों के बीच सुलह वार्ता का समर्थन करना शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप बीजिंग घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए। इन राजनयिक पहलों का क्षेत्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस पृष्ठभूमि में, कई पर्यवेक्षक ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष में चीन की स्थिति और कार्यों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि चीन तनाव कम करने और राजनीतिक समाधानों को बढ़ावा देने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा। हाल के वर्षों में चीन ने यह दिखाया है कि वह केवल आर्थिक शक्ति ही नहीं, बल्कि एक शांति निर्माता के रूप में भी उभरना चाहता है। क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए उसने विभिन्न देशों के साथ संवाद बढ़ाया है और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में काम किया है। चीन का यह दृष्टिकोण “साझा भविष्य के समुदाय” की उसकी व्यापक विदेश नीति का हिस्सा है।

चीन केवल बयानों तक सीमित नहीं है। उसने मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया को पटरी पर लाने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। गाजा में मानवीय सहायता: चीन ने गाजा में विस्थापित लोगों के लिए कई खेप में खाद्य, दवा और राहत सामग्री भेजी है। साथ ही, उसने संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के माध्यम से फलस्तीनियों के लिए धनराशि जारी की है। UNSC में संघर्षविराम प्रस्ताव: चीन ने संयुक्त राष्ट्र में तत्काल संघर्षविराम, बिना शर्त बातचीत और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों का समर्थन किया है। उसने उन प्रस्तावों पर वीटो का उपयोग करने वाले देशों की आलोचना भी की है। चीन ने शुरुआत में ही अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों का विरोध किया था और इस बात पर ज़ोर दिया था कि ऐसे कदम क्षेत्रीय स्थिरता को कमज़ोर कर सकते हैं। साथ ही, चीन ने ईरान को प्रत्यक्ष सैन्य सहायता नहीं दी है। इसके साथ ही, चीन ने ईरान की कार्रवाइयों, जिनमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकाबंदी और पड़ोसी खाड़ी अरब देशों में लक्ष्यों पर हमले शामिल हैं, से जुड़े संभावित तनाव बढ़ने के जोखिमों पर भी चिंता व्यक्त की है।

ईरान और अरब देशों ने चीन की भूमिका की सराहना की है। ईरानी विदेश मंत्री ने हाल ही में तेहरान में चीनी राजदूत से मुलाकात करते हुए कहा, “चीन एक ऐसी शक्ति है जो निष्पक्षता से मामलों को देखता है। उसकी पहल से क्षेत्र में युद्ध टल सकता है।”वहीं, रूस, तुर्की और कतर ने भी चीन के प्रयासों को रेखांकित किया है।

मध्य पूर्व के वर्तमान संकट में कई अन्य देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी युद्ध को रोकने और शांति बहाल करने के प्रयास कर रहे हैं। कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय किया जा रहा है, बैक-डोर बातचीत चल रही है, और संघर्ष विराम के लिए विभिन्न प्रस्ताव सामने आ रहे हैं। हालांकि, जमीनी स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी पक्ष धैर्य और विवेक से काम लें, तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। 

अंततः मध्य पूर्व में शांति की बहाली केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकता है। चीन सहित सभी जिम्मेदार शक्तियों के लिए यह समय है कि वे अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए संवाद, सहयोग और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को आगे बढ़ाएं। युद्ध की आग को बुझाने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए यही एकमात्र रास्ता है।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)  

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