कुरुक्षेत्र। Haryanvi rural culture will be alive बैसाखी महोत्सव में प्रदेश की परंपरागत सांस्कृतिक विरासत देखने को मिली। महोत्सव में विरासत दि हेरिटेज विलेज कुरुक्षेत्र की ओर से हरियाणा पैवेलियन में सांस्कृतिक प्रदर्शनी हरियाणा के हस्तशिल्प का आकर्षण का केंद्र बनी है।
डीसी विश्राम मीणा ने कहा कि विरासत प्रदर्शनी में हरियाणा के गांवों से जुड़ी हुई सभी प्राचीन वस्तुओं का प्रदर्शन किया जा रहा है, जो अब लुप्तप्राय हो चुकी हैं। विरासत हेरिटेज विलेज का प्रयास है कि अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए इन वस्तुओं को संजो कर रखा जा सके जिससे वे इनको देखकर इन पर गर्व अनुभव कर सकें। उन्होंने कहा कि इस विरासत प्रदर्शनी के हरियाणा पैवेलियन में मेले का मुख्य आकर्षण हरियाणवी पगड़ी का सेक्शन व सेल्फी प्वाइंट है, जिसमें पगड़ी बंधाओ, फोटो खिंचाओ इवेंट के माध्यम से युवा हरियाणा की पगड़ी परम्परा से रूबरू हो रहे है।

उन्होंने कहा कि बैसाखी मेला न केवल मनोरंजन का साधन होगा, बल्कि युवाओं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोडऩे का एक सशक्त माध्यम भी बनेगा। यह आयोजन हरियाणा की समृद्ध लोक संस्कृति, कला और परंपराओं को संरक्षित और प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
इसी के साथ लोक पारंपरिक हस्तकला के अनेक हरियाणवी नमूने हरियाणवी फुलझड़ी, हरियाणवी लोक वेशभूषा प्रदर्शनी में पारंपरिक परिधानों को जीवंत रूप से दिखाने के लिए महिला द्वारा पारंपरिक पहनावे में ग्रामीण जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। उन्होंने कहा कि इस मेले में हरियाणा की फुलकारी कला को दिखाया गया है, जिसमें शिल्पकार मौके पर ही सुंदर डिज़ाइन तैयार करते नजर आ रहे है। वहीं कुम्हार द्वारा पारंपरिक चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते देखना दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
मेले में लोहार कला के माध्यम से प्राचीन ताले भी प्रदर्शित कर रहे है इसके अलावा रथ निर्माण कला के माध्यम से हरियाणा के पारंपरिक परिवहन और उससे जुड़ी कारीगरी को दर्शाया गया है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही इंडी बनाने की पारंपरिक विधि, बिजना और दरी बुनाई जैसे शिल्प, गुड़्डा-गुडिय़ा निर्माण, पीढ़ा और चारपाई बुनाई विशेष रूप से खाट (चारपाई) बुनाई का प्रदर्शन भी मेले में जीवंत रूप में देखने को मिल रहे है, खाट एवं पीढ़ा हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। पीढ़ा, खटौला, खाट, पिलंग, दैहला आदि घरों, बैठकों एवं चौपालों में प्रयोग किए जाते रहे हैं। यहां पर सैंकड़ों वर्ष पुराने तांबे और पीत्तल के बर्तन भी प्रदर्शित किए गए है।
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