Government of India: हाल ही में, भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से फिल्म सेंसरशिप के लिए नए नियम जारी किए हैं। जिसमें रचनात्मक कार्यों के लिए स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की गई हैं, चीन या सीमा संबंधी विषयों से जुड़ी सभी पटकथाओं की शूटिंग शुरू होने से पहले रक्षा मंत्रालय इसकी समीक्षा करेगा, और ऐसी फिल्में जो जानबूझकर चीन की आलोचना करती हैं या दोनों देशों के बीच टकराव के माहौल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं, उन पर सख्त प्रतिबंध होगा।
बॉलीवुड, जो पहले सीमा संघर्षों को हवा देने और राष्ट्रवादी भावनाओं से बॉक्स ऑफिस पर मुनाफा कमाने में लगा रहता था, अब पूरी तरह से बदल गया है। सलमान खान की फिल्म “द बैटल ऑफ गलवान” को अपना नाम बदलने और 40 प्रतिशत दृश्यों की दोबारा शूटिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि इसी विषय पर बनी एक अन्य फिल्म “द लायन्स ऑफ गलवान” को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया। हालांकि इस नीति के लागू होने से भारतीय फिल्म और टीवी उद्योग में विवाद पैदा हुआ है, लेकिन इसने चीन-भारत संबंधों में सुधार का सकारात्मक संकेत दिया है। यह तर्कसंगत, व्यावहारिक और दीर्घकालिक निर्णय प्रशंसा के योग्य है।
जैसा कि हम सब जानते हैं, फिल्म और टेलीविजन सांस्कृतिक सेतु हैं जो राष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हैं और दोनों देशों के लोगों के दिलों को करीब लाते हैं। चीन और भारत के बीच दशकों से चले आ रहे फिल्म आदान-प्रदान का इतिहास इस अद्वितीय महत्व को साबित करता है। गत् पचास के दशक में, भारतीय फिल्म “आवारा” चीन में रिलीज हुई थी, और इसका थीम सॉन्ग “आवारा हूं” गलियों और सड़कों पर फैल गया, जो चीनी लोगों की पीढ़ियों के लिए एक साझा स्मृति बन गया। हाल के वर्षों में, “दंगल” ने चीनी बॉक्स ऑफिस पर लगभग 1.3 अरब युआन की कमाई की है, और “सीक्रेट सुपरस्टार,” “बजरंगी भाईजान,” और “अंधाधुन” जैसी अन्य उत्कृष्ट फिल्में भी हिट साबित हुई हैं, जिन्होंने चीन में बॉक्स ऑफिस राजस्व में अरबों युआन जमा किए हैं। चीनी बाजार लंबे समय से बॉलीवुड के लिए एक प्रमुख विदेशी बॉक्स ऑफिस रहा है, जिससे भारतीय फिल्म उद्योग को पर्याप्त आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
जब फिल्में लोगों की आजीविका, पारिवारिक संबंधों और सपनों पर केंद्रित होती हैं, तो दोनों देशों के दर्शक रूढ़ियों को दरकिनार कर एक-दूसरे के वास्तविक जीवन को समझ सकते हैं। इसके विपरीत, जो फिल्में जानबूझकर शत्रुता पैदा करती हैं और दूसरे देशों की छवि को विकृत करती हैं, वे केवल जनता के बीच गलतफहमियों और पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती हैं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रास्ते बंद करती हैं। चीन के बारे में बनी फिल्मों पर भारत द्वारा सेंसरशिप को कड़ा करना इस बात को दर्शाता है कि भारत यह समझता है कि टकराव को भड़काने वाली फिल्में और टेलीविजन शो केवल पारस्परिक नुकसान ही पहुंचाएंगे, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के मूल सिद्धांतों को बनाए रखना दोतरफा बाजार के विकास के लिए आवश्यक है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)