Last Updated: October 1, 2026

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उपवास में करें इसका सेवन, भरपूर रहेगी पौष्टिकता और ऊर्जा

July 2, 2026

उपवास में करें इसका सेवन, भरपूर रहेगी पौष्टिकता और ऊर्जा

Buckwheat flour : superfood or something else : नवरात्र आते ही घर-घर में व्रत के पकवानों की खुशबू फैल जाती है और कुट्टू का आटा लोगों की थाली का अहम हिस्सा बन जाता है। पौष्टिकता और ऊर्जा से भरपूर माना जाने वाला यह आटा उपवास के दौरान खूब खाया जाता है, लेकिन हर साल इससे जुड़ी कुछ स्वास्थ्य संबंधी घटनाएं भी सामने आती हैं।

इस आटे का इतना महत्व क्यों?

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर कुट्टू क्या है, व्रत में इसे इतना महत्व क्यों दिया जाता है और किन कारणों से यह कभी-कभी सेहत के लिए खतरा बन जाता है। कुट्टू का आटा, जिसे अंग्रेज़ी में बकव्हीट फ्लोर (Buckwheat Flour) कहा जाता है, अपने नाम के बावजूद गेहूं नहीं है। यह फैगोपाइरम एस्कुलेंटम (Fagopyrum esculentum) नामक पौधे के बीजों से तैयार किया जाता है। ग्लूटेन-फ्री होने के कारण यह व्रत रखने वालों के लिए एक लोकप्रिय और पौष्टिक विकल्प माना जाता है।

जानें, और किस नाम से जाना जाता है ये

भारत में इसे कई नामों से भी जाना जाता है—ताऊ, ओगला, ब्रेस और फाफड़। कुट्टू के पौधे के छोटे त्रिकोणीय बीजों को सुखाकर, छिलका उतारकर, पीसकर आटा बनाया जाता है। इस आटे का इस्तेमाल व्रत के दिनों में पूरी, पकौड़े और पैनकेक बनाने में किया जाता है। फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर: पाचन और ऊर्जा उत्पादन में मदद करता है। मधुमेह के लिए उपयुक्त: कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स इसे मधुमेह रोगियों के लिए सुरक्षित बनाता है।

जल्दी खराब हो जाता है ये आटा

अपने स्वास्थ्य लाभों के बावजूद, कुट्टू का आटा जल्दी खराब हो जाता है। इसकी शेल्फ लाइफ केवल एक से डेढ़ महीने की होती है। एक बार एक्सपायर हो जाने पर, इसे खाने से फ़ूड पॉइज़निंग हो सकती है। मिलावट एक और बड़ी समस्या है। शुद्ध कुट्टू का आटा भूरे रंग का होता है, जबकि मिलावटी आटा (गेहूँ या अन्य अनाज के साथ मिलाया गया) रंग और बनावट बदल देता है। असली आटा आसानी से गूँथ जाता है, जबकि मिलावटी आटा जल्दी उखड़ जाता है।

ये है कुट्टू के आटे का इतिहास

कुट्टू की खेती दक्षिण पूर्व एशिया में 5,000-6,000 साल पहले से होती आ रही है, जहाँ से यह मध्य एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप में फैला। प्रमाण बताते हैं कि फ़िनलैंड में 5300 ईसा पूर्व से ही इसका सेवन किया जाता रहा है। इसकी उत्पत्ति का पता मुख्यतः चीन और साइबेरिया से लगाया जाता है, हालाँकि यह प्राचीन ग्रीस के कुछ हिस्सों में भी उगाया जाता था।

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