Last Updated: October 24, 2026

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रक्षाबंधन पर बहनों को बिलखता देख पिता ने दे दी जान

September 1, 2026

रक्षाबंधन पर बहनों को बिलखता देख पिता ने दे दी जान

Father suicide after seeing sisters wailing : अहमदाबाद। 14 साल पहले पुलिस फायरिंग में 16 वर्षीय बेटे को खोने वाले पिता की न्याय की उम्मीद टूट गई। सुरेंद्रनगर के थानगढ़ में बेटे पंकज सुमरा के लिए वर्षों से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे 53 वर्षीय अमरशीभाई सुमरा ने उसी इलाके में चलती ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

2012 में पुलिस फायरिंग में हुई थी मौत

रक्षाबंधन के दिन बेटियों को भाई की याद में बिलखते देख पिता का दर्द और गहरा गया था। आरोप है कि 2012 की पुलिस फायरिंग में तीन दलित युवकों की मौत के 14 साल बाद भी परिवारों को न्याय नहीं मिला और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। बेटे की मौत का गम और लंबे इंतजार की टीस लिए अमरशीभाई आखिरकार जिंदगी की जंग हार गए। उल्लेखनीय है कि 53 वर्षीय अमरशीभाई सुमरा ने उसी इलाके में चलती ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी, जहां 14 साल पहले पुलिस फायरिंग में उनके 16 वर्षीय बेटे पंकज सुमरा की जान चली गई थी। परिजनों ने बताया कि अमरशीभाई ने रात के समय थानगढ़ और लखमांची के बीच चलने वाली हापा-मुंबई ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या की।

उनके संघर्ष की शुरुआत सितंबर 2012 में हुई थी, जब थानगढ़ के तरणेतर मेले के दौरान दलित और भरवाड़ समुदाय के लोगों के बीच विवाद हो गया था। इस हिंसक झड़प के बाद पुलिस ने फायरिंग की थी, जिसमें मेहुल राठौड़, पंकज सुमरा और प्रकाश परमार नामक तीन दलित युवकों की मौत हो गई थी। 2012 में हुई इस फायरिंग की घटना ने पूरे गुजरात को झकझोर कर रख दिया था और पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े थे। बढ़ते आक्रोश को देखते हुए राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी की टीम ने थानगढ़ जाकर मेला मैदान और रेलवे गेट का निरीक्षण किया था। टीम ने घटनास्थल की माप-तौल की थी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फायरिंग कहां से हुई थी, और पूरे इलाके की वीडियोग्राफी भी की गई थी।

रक्षाबंधन पर दलका दर्द और ले गया जान

घटना के 14 साल बीत जाने के बावजूद मृतकों के परिवारों का आरोप है कि उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है और मामले की जांच रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। अमरशीभाई अपने बेटे की मौत के बाद से ही व्यवस्था से लड़ रहे थे। इस साल रक्षाबंधन के दिन अपनी बेटियों को उनके दिवंगत भाई की याद में रोता-तड़पता देखकर वे पूरी तरह टूट गए थे। इसी गहरे मानसिक आघात और हताशा के चलते उन्होंने उसी जगह तीनों युवकों की याद में बने स्मारक के पास जाकर अपनी जान दे दी।

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