Last Updated: October 26, 2026

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विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त करने के प्रस्ताव के विरोध में HPUTWA का धरना-प्रदर्शन

September 2, 2026

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त करने के प्रस्ताव के विरोध में HPUTWA का धरना-प्रदर्शन

शिमला: हिमाचल प्रदेश के छह विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया में बदलाव कर शिक्षकों की नियुक्ति लोक सेवा आयोग के माध्यम से किए जाने संबंधी प्रस्तावित विधेयक के विरोध में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) द्वारा आज धरना-प्रदर्शन किया गया। धरने में विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ प्रोफेसरों एवं शिक्षकों ने भाग लिया और विधेयक के विरोध में अपने विचार रखे।

धरने को संबोधित करते हुए HPUTWA के अध्यक्ष प्रो. नितिन व्यास ने प्रस्तावित विधेयक के प्रति कड़े शब्दों में गंभीर चिंता एवं विरोध व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, संस्थागत पहचान और अकादमिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि भर्ती विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे बाहरी नियंत्रण में देना विश्वविद्यालयों के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि यदि विश्वविद्यालयों के रणनीतिक ही नहीं बल्कि दैनिक एवं नियमित प्रशासनिक और अकादमिक निर्णयों के लिए भी बाहरी स्वीकृतियों पर निर्भरता बढ़ती है, तो इससे निर्णय लेने में अनावश्यक विलंब होगा, विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वतंत्रता एवं लचीलापन कम होगा तथा शिक्षकों की संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी प्रभावित होगी। इसका प्रतिकूल प्रभाव शिक्षण, शोध और नवाचार पर पड़ सकता है।

HPUTWA का स्पष्ट मत है कि स्वायत्तता और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि किसी संस्था में अनियमितताओं के आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जाँच, ऑडिट, साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन तथा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। लेकिन कुछ संस्थानों में कथित अनियमितताओं के आधार पर सभी स्वायत्त विश्वविद्यालयों की शक्तियों और स्वायत्तता को सीमित करना उचित नहीं है। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि निर्णय पूर्वधारित धारणाओं पर आधारित हो सकता है।

वर्तमान परिस्थिति को Career Advancement Scheme (CAS) के लिए लंबे समय से चल रहे संघर्ष के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। CAS और अब विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का प्रश्न केवल सेवा-संबंधी मुद्दे नहीं हैं, बल्कि ये शैक्षणिक गरिमा, शिक्षक के पेशेवर सम्मान, संस्थागत स्वतंत्रता तथा विश्वविद्यालय के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

धरने के दौरान यह सवाल भी प्रमुखता से उठाया गया कि यदि Ph.D., शोध प्रकाशन, शोध अनुभव, अकादमिक उपलब्धियों और वर्षों के शैक्षणिक योगदान को उचित रूप से मान्यता नहीं दी जाएगी, तो फिर Ph.D. जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यता की प्रासंगिकता क्या रह जाएगी? उच्च शिक्षा का आधार ज्ञान, शोध, योग्यता, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता है। इसलिए नीतियाँ इन मूल्यों को मजबूत करने वाली होनी चाहिए।

HPUTWA सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने भी प्रस्तावित विधेयक पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल किसी एक विश्वविद्यालय या संगठन का विषय नहीं है। यदि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और भर्ती के अधिकार कमजोर होते हैं, तो इसका प्रभाव पूरे उच्च शिक्षा तंत्र पर पड़ सकता है। उन्होंने सभी शिक्षकों एवं कर्मचारियों से एकजुट होकर लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान किया।

📍 Location: शिमला (शिमला)

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