
नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्षी नेताओं की चिट्ठियों का सीधे जवाब नहीं देने और उनका अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संविधान और चुनाव सुधारों जैसे अहम मुद्दों पर सरकार अपनी मर्जी से फैसले ले रही है और विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया जा रहा है।
समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में खड़गे ने केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने रिजिजू को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार नहीं दिया है। खड़गे के मुताबिक, विपक्ष जब प्रधानमंत्री को किसी मुद्दे पर पत्र लिखता है, तो मोदी खुद जवाब देने के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति से जवाब तैयार करवाते हैं।
खड़गे ने कहा कि इस तरह का व्यवहार विपक्षी नेताओं और सभी विपक्षी दलों का अपमान है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रधानमंत्री खुद को संविधान से ऊपर मानते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार मनमाने तरीके से काम करती रही, तो देश की जनता उसे जवाबदेह ठहराएगी।
खड़गे ने दशहरे का जिक्र करते हुए सरकार को अपनी गलतियां सुधारने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने अपनी नीतियों और काम करने के तरीके में बदलाव नहीं किया और अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश नहीं की, तो जनता उसे इसका जवाब देगी।उन्होंने कहा कि सरकार को विपक्ष की बात सुननी चाहिए और लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करना चाहिए। खड़गे के अनुसार, संविधान से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले सभी संबंधित पक्षों से चर्चा करने के बाद ही लिए जाने चाहिए।
इस विवाद के बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार, 19 अक्टूबर को खड़गे के पत्र का जवाब दिया था। रिजिजू ने अपने पत्र में कहा था कि सरकार ने संबंधित विधेयक के प्रस्तावों पर चर्चा करने के लिए विपक्ष से कई बार संपर्क करने की कोशिश की थी।रिजिजू के मुताबिक, उन्होंने 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल 2026 को खड़गे को पत्र लिखकर इस मामले में कांग्रेस का समर्थन और सहयोग मांगा था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने खड़गे से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की थी। इसके अलावा, मॉनसून सत्र के दौरान उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी। इस तरह सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि विपक्ष से बातचीत करने की कोशिश की गई थी, जबकि खड़गे का आरोप है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष को उचित तरीके से विश्वास में नहीं ले रही है।
इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह परिसीमन का प्रस्ताव भी है। खड़गे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चौथा पत्र लिखकर मांग की थी कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को अंतिम रूप देने और संसद में पेश करने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। परिसीमन का मतलब चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को तय करना या उनमें बदलाव करना है। इससे संसद और अन्य निर्वाचित संस्थाओं में अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से खड़गे ने इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा की जरूरत बताई है। उन्होंने सरकार से कहा कि किसी भी नए परिसीमन प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले सभी राजनीतिक दलों को अपनी राय रखने का पर्याप्त मौका दिया जाए। उनके अनुसार, इतने बड़े संवैधानिक बदलाव पर एकतरफा फैसला लेना उचित नहीं है।
खड़गे ने अपने पत्र में संसद के मॉनसून सत्र की स्थिति को लेकर भी स्पष्ट जानकारी मांगी। उन्होंने सरकार से यह बताने को कहा कि सत्र को औपचारिक रूप से समाप्त क्यों नहीं किया गया है और इस संबंध में सरकार की आगे की योजना क्या है। उन्होंने चेतावनी दी कि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना आगे बढ़ने से राजनीतिक विवाद और कानूनी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
खड़गे ने जोर दिया कि सरकार को राजनीतिक दलों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ गंभीरता से चर्चा करनी चाहिए, ताकि किसी भी फैसले पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश की जा सके। कुल मिलाकर, परिसीमन पर चर्चा की मांग और प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों के जवाब को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। जहां खड़गे सरकार पर विपक्ष की अनदेखी करने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं रिजिजू ने दावा किया है कि सरकार ने विपक्ष से बातचीत करने के लिए कई बार प्रयास किए हैं।