
Kullu Artisans Keep Centuries-Old Divine Craftsmanship Alive : कुल्लू। पहाड़ों की आस्था, परंपरा और संस्कृति को अपनी कला में संजोए कुल्लू के कारीगर आज भी पीढ़ियों पुरानी हस्तकला को जीवित रखे हुए हैं। धातु पर हथौड़े की हर चोट से देवी-देवताओं के मोहरे, घंटियां और पवित्र नरसिंघा आकार लेते हैं। अब नरसिंघा को GI टैग मिलने से इस पारंपरिक कला को नई पहचान मिलने की उम्मीद जगी है।
कभी मंदिरों और देवकार्यों तक सीमित रहने वाला यह वाद्य यंत्र अब सजावट की दुनिया में भी अपनी जगह बना रहा है। कुल्लू में भी कई कारीगर धातु से देवी देवताओं को मोहरे, घंटिया, पूजा सामग्री और वाद्य यंत्र तैयार करने का काम कर रहे है। केंद्र सरकार के द्वारा रणसिंघा को GI टैग मिलने के बाद अब वाद्य यंत्रों के प्रति लोगों का और आकर्षण बढ़ाने लगा है। जरी के रहने वाले दुनिचंद ने बताया कि उनका परिवार कई पीढिय़ों से देवी रेवताओं के मंदिरों में इस्तेमाल होने वाले इन समानों को तैयार कर रहा है। ऐसे में उनके द्वारा धातु को हाथ की कला से ही आकर देकर खूबसूरत सामान तैयार किया जाता है। वहीं, देवी देवताओं के पास इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्र भी वह ख़ुद ही तैयार करते है।
उन्होंने बताया कि हिमाचल में मंदिरों में देव कार्यों में नरसिंघा की मधुर ध्वनी रहती है। इस नरसिंघा को भी सोना, चांदी, तांबा और पीतल जैसी धातुओं से तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि एक नरसिंघा को बनाने में कई बार 4से 5 दिन का समय लग जाता हैअ इसकी ध्वनि मधुर रहे इसके लिए इसके आकर को बड़ी बारीकी से बनाना पड़ता हैअ उन्होंने बताया कि अधिकांश लोगों को रणसिंघा और नरसिंघा को लेकर कन्फ्यूजन होता है, लेकिन प्राचीन समय में राजा के पास जिस वाद्य यंत्र का प्रयोग रण क्षेत्र में युद्ध रोकने, शुरू करने और विशेष सूचना देने के लिए किया जाता था। इसलिए इसका नाम रणसिंघा पड़ा। जबकि हिमाचल ने अधिकांश क्षेत्र में इसे देवी देवताओं के मंदिरों के देव कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। इस कारण इसका नाम नरसिंघा है, लेकिन दोनों ही वाद्य यंत्र एक ही है।
उन्होंने बताया कि GI टैग मिलने के बाद से अब इसको आम लोग भी जानने लगे है. और ऐसे में अब हिमाचल के कारीगरों को भी इसका फायदा होगा। कुरुमदेव ने बताया कि वह मूलतः थाची से है। उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी से ही हाथ की कला से समान बनाने का काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि धातु से इन सामानों को तैयार करने में समय लगता है, क्योंकि धातु पर खूबसरत आकृतियां उकेरने और उसके इस्तेमाल के लिए बनाए में हाथों से ही सब काम किया जाता है। उन्होंने बताया कि अब नरसिंघा को लोग न सिर्फ़ मंदिरों में इस्तेमाल के लिए ले जाते है। बल्कि इसकी छोटी आकृतियों को सजावट के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। अलग अलग धातु में बने नरसिंघा की कीमत भी अलग अलग रहती है। ऐसे में 10 हजार से शुरु होकर 40 हजार की कीमत तक भी इसे बनाया जा सकता है। कुरुमदेव ने बताया कि नरसिंघा की ध्वनि को बेहद पवित्र माना जाता है। पहाड़ों में लोग मानते है कि जहां इसकी ध्वनि रहती है वहां कोई भी नकारात्मक शक्तियां टिक नहीं पाती है।
वेद प्रकाश ने बताया कि वह अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने और रोजगार कमाने के लिए इस कला से जुड़े हुए है. उन्होंने बताया कि उनके द्वारा अलग अलग वाद्य यंत्रों को भी तैयार किया जाता है। ऐसे में GI टैग मिलने के बाद कारीगरों की ओर से नरसिंघा को सजावट के समान के तौर पर भी छोटी आकृतियों में बनाया जा रहा है। हालांकि अभी कम ही लोगों को इसकी खासियत का ज्ञान है। ऐसे में इसकी खासियत आम जनता तक पहुंचने पर कारीगरों को भी फायदा मिलेगा।
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