
शिमला: हिमाचल प्रदेश में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (हुप्टा) ने प्रदेश सरकार की ओर से लाए जा रहे हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 का कड़ा विरोध किया है। संघ का आरोप है कि इस विधेयक के माध्यम से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करने और उनके प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके विरोध में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के शिक्षक, गैर-शिक्षक कर्मचारी, शोधार्थी और पूर्व छात्र 5 नवंबर को सुबह 11 बजे शिमला के समर्पित राज्य विश्वविद्यालय के सभागार में एकत्रित होंगे।
संघ की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने कृषि, वानिकी, बागवानी, विज्ञान, कला, विधि, गणित, भाषा, चिकित्सा, प्रशासन और राजनीति सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विश्वविद्यालयों ने प्रदेश के शैक्षणिक और बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में इन संस्थानों की स्वायत्तता को कमजोर करना प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के भविष्य के लिए उचित नहीं होगा।
संघ ने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्थापना से लेकर अब तक इन संस्थानों ने शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध और नवाचार के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के माध्यम से इन्हें जो स्वायत्तता प्रदान की गई है, वह इनके स्वतंत्र शैक्षणिक संचालन के लिए बेहद जरूरी है। विश्वविद्यालय अपनी स्वायत्तता के तहत राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रहकर यूजीसी के मानकों और विधि के अनुसार कार्य करते हैं।
संघ के अनुसार प्रदेश सरकार 2 सितंबर को विधानसभा में हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 लेकर आई है। इसके तहत वर्ष 1970 के हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम में बदलाव प्रस्तावित हैं। सरकार का तर्क है कि वित्तीय कुप्रबंधन के मामलों को देखते हुए शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में निष्पक्षता लाई जानी चाहिए। हालांकि, संघ का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन के जरिए विश्वविद्यालयों के कार्यकारी परिषद और कुलपति की शक्तियां समाप्त कर वित्त सचिव को सौंपने तथा नियुक्तियों को प्रदेश लोक सेवा आयोग और राज्य चयन आयोग के माध्यम से करवाने की व्यवस्था की जा रही है।
संघ ने सवाल उठाया है कि जब विश्वविद्यालयों में कुलपति, रजिस्ट्रार, वित्त अधिकारी और संयुक्त नियंत्रक सहित विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां सरकार के माध्यम से होती हैं और विश्वविद्यालयों के वित्तीय नियंत्रण की जिम्मेदारी भी सरकार के पास है, तो वित्तीय अनियमितताओं के लिए केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। संघ का मानना है कि इस तरह के बदलावों से उच्च शिक्षा व्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण बढ़ेगा और विश्वविद्यालयों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली प्रभावित होगी।
बयान में आशंका जताई गई है कि इस व्यवस्था से शोध और नवाचार का वातावरण कमजोर होगा। शोधार्थियों को प्रयोगशालाओं में बिना थके काम करने के बजाय सरकारी दफ्तरों की तरह निर्धारित समय तक काम करने वाली व्यवस्था में बांध दिया जाएगा। इससे नई खोजों, वैज्ञानिक प्रयोगों, कृषि तकनीकों के विकास और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे उभरते क्षेत्रों में शोध कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
संघ ने आरोप लगाया कि सरकार ने विधेयक को सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपतियों की सहमति के लिए भेजने के बजाय सीधे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेज दिया है। ऐसे में संघ ने सरकार से मांग की है कि संशोधन विधेयक को रोककर शिक्षकों के साथ विस्तृत चर्चा की जाए और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से जुड़े सभी पहलुओं पर विचार किया जाए।
संघ ने प्रदेश के शिक्षकों, गैर-शिक्षक कर्मचारियों, शोधार्थियों और पूर्व विद्यार्थियों से 5 नवंबर को शिमला के समरहिल स्थित विश्वविद्यालय के सभागार में पहुंचने की अपील की है। इस दौरान संशोधन विधेयक के विरोध में रणनीति तैयार की जाएगी और आगामी आंदोलन की रूपरेखा तय होगी।
संघ ने स्पष्ट किया कि उसका विरोध किसी राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और प्रदेश में उच्च शिक्षा के हितों की रक्षा के लिए है। संघ का कहना है कि शिक्षा, शोध और नवाचार को सरकारी नियंत्रण से नहीं चलाया जा सकता। प्रदेश के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और उनके संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखना जरूरी है।
📍 Location: शिमला (शिमला)