Last Updated: October 31, 2026

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कांगड़ा की सियासत में विपिन परमार का बढ़ता राजनीतिक कद, धर्मशाला के शंखनाद से प्रदेश की राजनीति में फिर उभरी सक्रिय भूमिका

October 31, 2026

कांगड़ा की सियासत में विपिन परमार का बढ़ता राजनीतिक कद, धर्मशाला के शंखनाद से प्रदेश की राजनीति में फिर उभरी सक्रिय भूमिका

धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कांगड़ा जिला हमेशा से सत्ता और संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने में इस जिले की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कांगड़ा की इसी राजनीतिक जमीन से उभरे भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सुलह विधानसभा क्षेत्र से विधायक विपिन सिंह परमार का राजनीतिक सफर एक बार फिर चर्चा में है। धर्मशाला में 30 अक्टूबर को आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ पदयात्रा के माध्यम से उनकी संगठनात्मक सक्रियता और राजनीतिक भूमिका सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आई है।

धर्मशाला में आयोजित इस पदयात्रा को भाजपा के प्रदेशव्यापी राजनीतिक अभियान का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। इस कार्यक्रम में सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज के साथ पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विपिन सिंह परमार ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। यह आयोजन महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कांगड़ा में भाजपा के संगठनात्मक जनसंपर्क और आगामी राजनीतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। परमार की सक्रिय भागीदारी ने उनके राजनीतिक अनुभव और संगठन के प्रति उनकी भूमिका को फिर रेखांकित किया है।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर, संगठन में बनाई अलग पहचान

विपिन सिंह परमार का राजनीतिक जीवन छात्र राजनीति से प्रारंभ हुआ। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में कदम रखने वाले परमार ने संगठनात्मक गतिविधियों के बीच अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। युवा मोर्चा से लेकर जिला और प्रदेश भाजपा संगठन तक विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने राजनीति में अपना स्थान बनाया।

उनका सफर इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने संगठनात्मक राजनीति के साथ-साथ चुनावी और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी काम किया। वर्ष 1998 में पहली बार सुलह विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होने के बाद 2007 और 2017 में भी विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2017 में भाजपा सरकार बनने के बाद उन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद 26 फरवरी 2020 को उन्होंने हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष का पद संभाला और दिसंबर 2022 तक इस संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन किया।वर्ष 2022 में उन्होंने सुलह विधानसभा क्षेत्र से पुनः जीत दर्ज कर विधानसभा में अपनी उपस्थिति बनाए रखी। इस प्रकार उनका राजनीतिक सफर संगठन, सरकार, विधानसभा और निर्वाचन क्षेत्र—चारों स्तरों पर फैला हुआ है।

मंत्री से विधानसभा अध्यक्ष तक, प्रशासनिक और विधायी अनुभव की लंबी पारी

प्रदेश की राजनीति में किसी नेता का मूल्यांकन केवल उसके चुनावी सफर से नहीं, बल्कि उसे मिली जिम्मेदारियों और उनके निर्वहन के अनुभव से भी किया जाता है। परमार के राजनीतिक जीवन में स्वास्थ्य मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के पद दो महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की जिम्मेदारी संभाली। वहीं विधानसभा अध्यक्ष के रूप में सदन की कार्यवाही का संचालन करना और संसदीय परंपराओं एवं प्रक्रियाओं के अनुरूप विधायी कार्यवाही को आगे बढ़ाना उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा।

विधानसभा अध्यक्ष का पद राजनीतिक जीवन में एक विशिष्ट संवैधानिक जिम्मेदारी रखता है। इस पद पर रहते हुए सदन की मर्यादा, प्रक्रिया और विधायी कामकाज से जुड़े अनुभव ने उनके राजनीतिक सफर को एक अलग आयाम दिया। यही अनुभव आज उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कांगड़ा की राजनीति में परमार की सक्रियता क्यों महत्वपूर्ण?

कांगड़ा जिला प्रदेश की राजनीति में अपनी व्यापकता और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या के कारण विशेष महत्व रखता है। यहां संगठन को मजबूत रखना, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बनाए रखना और अलग-अलग क्षेत्रों के मुद्दों को राजनीतिक मंच पर उठाना किसी भी वरिष्ठ नेता के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। परमार का राजनीतिक आधार सुलह विधानसभा क्षेत्र में है, लेकिन उनका अनुभव जिला और प्रदेश स्तर की राजनीति तक फैला हुआ है। प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष की वर्तमान जिम्मेदारी के साथ उनका राजनीतिक दायरा केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। धर्मशाला जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र में आयोजित प्रदेशव्यापी अभियान में उनकी भागीदारी इसी व्यापक संगठनात्मक भूमिका को सामने लाती है। भाजपा की ओर से उन्हें संगठन में वरिष्ठ जिम्मेदारी मिलना भी उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और पार्टी में उनकी निरंतर सक्रियता के संदर्भ में देखा जा सकता है।

धर्मशाला का शंखनाद और 2027 से पहले राजनीतिक सक्रियता का नया संदर्भ

30 अक्टूबर को धर्मशाला से शुरू हुआ ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ अभियान भाजपा की आगामी संगठनात्मक गतिविधियों का हिस्सा है। इसके तहत शिमला, मंडी और हमीरपुर में भी पदयात्राओं का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। धर्मशाला की पदयात्रा के संदर्भ में परमार ने निर्वाचन प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, संवैधानिक संस्थाओं और कांग्रेस की राजनीतिक बयानबाजी पर सवाल उठाए। उन्होंने प्रदेश की कांग्रेस सरकार को दस गारंटियों, रोजगार, आर्थिक स्थिति और विकास कार्यों के मुद्दों पर भी घेरा।

इस प्रकार उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चल रही लोकतंत्र और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़ी बहस को हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक एवं जनहित के मुद्दों से जोड़ने का प्रयास किया। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के लिए प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों को गति देना महत्वपूर्ण है। ऐसे में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और वर्तमान विधायक के रूप में परमार का अनुभव तथा संगठनात्मक भूमिका इस अभियान के संदर्भ में उल्लेखनीय है।

राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक जिम्मेदारी और आगे की भूमिका पर निगाहें

विपिन सिंह परमार का राजनीतिक सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा है। छात्र राजनीति, संगठनात्मक जिम्मेदारियां, विधानसभा सदस्यता, मंत्रिमंडल में स्थान और विधानसभा अध्यक्ष का संवैधानिक पद—इन सभी अनुभवों ने उनके सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग आयाम दिए हैं। आज जब हिमाचल प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं, तब कांगड़ा के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और संगठनात्मक सक्रियता भी चर्चा का विषय है। धर्मशाला से शुरू हुए भाजपा के इस अभियान में परमार की भागीदारी उनके राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण वर्तमान संदर्भ बनकर सामने आई है।

कांगड़ा की राजनीति में उनका आगे का दायरा और प्रदेश भाजपा के अभियानों में उनकी भूमिका आने वाले समय में किस रूप में विकसित होती है, इस पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी। धर्मशाला का शंखनाद एक कार्यक्रम भर नहीं, बल्कि विपिन सिंह परमार के लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक जिम्मेदारी और प्रदेश की राजनीति में उनकी वर्तमान सक्रियता को देखने का एक नया अवसर बनकर सामने आया है।

📍 Location: शिमला (शिमला)

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