
शिमला: भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल प्रदेश द्वारा रविवार को गेयटी थियेटर, शिमला में राज्य स्तरीय पहाड़ी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के.आर. भारती, विभाग के अतिरिक्त निदेशक श्री चंदन कपूर तथा अन्य गणमान्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के.आर. भारती ने कहा कि पहाड़ी भाषा हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता और गौरवशाली विरासत का महत्वपूर्ण आधार है। प्रदेश की लोकभाषाओं में यहां का इतिहास, लोकजीवन, परंपराएं और सामाजिक चेतना समाहित हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ी भाषा एवं लोक साहित्य का संरक्षण हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अतिरिक्त निदेशक चंदन कपूर ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक चेतना और लोक परंपराओं की संवाहक होती है। पहाड़ी भाषा हिमाचल प्रदेश की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि पहाड़ी भाषा एवं इसकी विभिन्न बोलियों के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। युवा पीढ़ी को मातृभाषा और लोक साहित्य से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
उल्लेखनीय है कि 1 नवंबर, 1966 को पंजाब पुनर्गठन के तहत पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति सहित विभिन्न क्षेत्रों का हिमाचल प्रदेश में विलय हुआ था। इस ऐतिहासिक घटना ने प्रदेश के वर्तमान स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी ऐतिहासिक दिवस की स्मृति और प्रदेश की समृद्ध भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 नवंबर को पहाड़ी दिवस मनाया जाता है।
कवि सम्मेलन में 25 से 30 कवियों ने किया मौलिक रचनाओं का पाठ
समारोह के प्रथम सत्र में प्रातः 10:30 बजे कॉन्फ्रेंस हॉल में राज्य स्तरीय पहाड़ी कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों से पहुंचे लगभग 25 से 30 कवियों ने पहाड़ी भाषा में अपनी मौलिक रचनाओं का पाठ किया। कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिमाचल की लोक संवेदनाओं, सामाजिक जीवन, प्रकृति, परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
कवि सम्मेलन में अशोक दर्द, विक्रम कौशल, राकेश कपूर, रमेश चंद्र मस्ताना, प्रताप जरियाल, दोतराम पहाड़िया, होशियार सिंह, रविंद्र सारथी, राजपाल कूटलैहड़िया, डॉ. सतनाम सिंह, संदेश शर्मा, जीत राम सुमन, अनंत आलोक, मदन हिमाचली, हेमंत अत्री, त्रिलोक सूर्यवंशी, भूप सिंह रंजन, बबीता ठाकुर एवं ध्यान सिंह भागटा सहित अन्य कवियों ने भाग लिया। सम्मेलन का मंच संचालन त्रिलोक सूर्यवंशी ने किया, जबकि वरिष्ठ साहित्यकार मदन हिमाचली ने इसकी अध्यक्षता की।
लोकगाथाओं और पारंपरिक गायन ने दिखाई हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत
समारोह के दूसरे सत्र में दोपहर 1 बजे मुक्ताकाश मंच पर प्राचीन लोकगाथाओं पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की गईं। इसमें इतिहास संकलन समिति, निरमंड, कुल्लू द्वारा पारंपरिक छाड़ी गायन, अवतार एंड रूहनू पार्टी, चंबा द्वारा मुसादा गायन, जैरी ग्रुप, भरमौर, चंबा द्वारा लोक रामायण गायन, सांस्कृतिक कला मंच, बाऊनल, सिरमौर द्वारा भारतो गायन तथा नारायण सिंह चौहान एवं साथियों द्वारा शिमला जिला के पारंपरिक बरलाज गायन की प्रस्तुतियां दी गईं।
इन प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रदेश की प्राचीन लोकगाथाओं, मौखिक परंपराओं और लोक संगीत की समृद्ध विरासत का सजीव चित्रण किया गया। कलाकारों ने पारंपरिक गायन शैलियों के माध्यम से हिमाचल की सांस्कृतिक विविधता को मंच पर जीवंत किया।
समारोह का उद्देश्य पहाड़ी भाषा, साहित्य, लोक संस्कृति एवं पारंपरिक लोक कलाओं का संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार करना है। विभाग द्वारा ऐसे आयोजनों के माध्यम से प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ युवा पीढ़ी को अपनी मातृभाषा, लोक साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इस अवसर पर सहायक निदेशक सुरेश राणा, सुनीला ठाकुर, सांस्कृतिक आयोजक जविंदर सिंह सहित विभाग के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
📍 Location: शिमला (शिमला)