Last Updated: November 7, 2026

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देरी से निगम के राजस्व पर भी असर, डीम्ड परमिशन के लिए अदालत पहुंच रहे आवेदक

November 7, 2026

देरी से निगम के राजस्व पर भी असर, डीम्ड परमिशन के लिए अदालत पहुंच रहे आवेदक

SMC Faces Questions Over Delayed Building Permissions : श्रीनगर। नगर निगम में बिल्डिंग परमिशन की धीमी प्रक्रिया ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। आवेदकों का आरोप है कि सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद उनकी फाइलें हफ्तों और महीनों तक लंबित रहती हैं। अंदरूनी सूत्रों ने प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार की आशंका जताते हुए दावा किया है कि निगम महीने में केवल 3 से 4 बिल्डिंग परमिशन जारी कर रहा है।

कई आवेदकों ने ‘कश्मीर न्यूज़ ट्रस्ट’ को बताया कि उन्हें बार-बार SMC दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, और हर बार यही कहा जाता है कि परमिशन “आज या कल” मिल जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सभी जरूरी शर्तें पूरी करने के बाद भी उनकी फाइलें पेंडिंग पड़ी हैं, जिससे वे यह नहीं जान पा रहे हैं कि उन्हें मंजूरी कब मिलेगी। इस देरी ने नगर निगम के कामकाज में पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आवेदनों पर काम करने की धीमी रफ्तार से भ्रष्टाचार पनपने के हालात बन रहे हैं। निगम के कामकाज की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, SMC अभी एक महीने में केवल 3 से 4 बिल्डिंग परमिशन ही जारी कर रहा है।

यह रफ्तार उस शहर के हिसाब से बहुत धीमी है, जहां रेजिडेंशियल और कमर्शियल निर्माण की भारी मांग है। उनका कहना है कि इस देरी से न केवल आवेदकों को परेशानी हो रही है, बल्कि निगम के राजस्व कमाने की क्षमता पर भी असर पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, SMC कमर्शियल निर्माण की परमिशन के लिए लगभग 5 से 8 लाख रुपये वसूलता है, जबकि रेजिडेंशियल बिल्डिंग परमिशन के लिए यह शुल्क करीब 25,000 रुपये है। उनका तर्क है कि अगर आवेदनों पर समय रहते और पारदर्शी तरीके से काम किया जाए, तो निगम अच्छा-खासा राजस्व कमा सकता है, बजाय इसके कि फाइलें हफ्तों या महीनों तक पेंडिंग पड़ी रहें। सूत्रों का यह भी मानना ​​है कि इस स्थिति से गड़बड़ियों के लिए रास्ता खुल सकता है।

जो आवेदक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भी परमिशन नहीं पा पाते, वे शायद आधिकारिक प्रक्रिया से बचने के लिए एनफोर्समेंट अधिकारियों या वार्ड अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे हालात अवैध लेन-देन के मौके पैदा करते हैं और एक व्यवस्थित बिल्डिंग परमिशन सिस्टम के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देते हैं। यह मुद्दा तब और भी अहम हो गया, जब हाल ही में SMC के नए कमिश्नर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। बताया जा रहा है कि उन्होंने अवैध निर्माणों को रोकने में नाकाम रहने पर एनफोर्समेंट और वार्ड अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। हालाँकि, अंदरूनी सूत्रों ने सवाल उठाया है कि क्या निगम अपनी प्रशासनिक कमियों की भी उतनी ही गंभीरता से जाँच कर रहा है।

उनका तर्क है कि जहाँ एक ओर अनधिकृत निर्माण को रोकने में विफल रहने के लिए वार्ड अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन देरी पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है, जिसके कारण वैध निर्माण अनुमति चाहने वाले आवेदक लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में रहते हैं। अंदरूनी सूत्रों ने कहा, “सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद लोगों से अनिश्चित काल तक इंतजार करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जब सिस्टम समय पर अनुमति देने में विफल रहता है, तो प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि आवेदकों को दूसरे विकल्पों की तलाश करने के लिए क्या मजबूर कर रहा है।”

एक और चिंता यह है कि निगम से समय पर निर्णय न मिलने के कारण, कई आवेदक अब ‘डीम्ड बिल्डिंग परमिशन’ (मान ली गई निर्माण अनुमति) पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, ऐसे मामलों से न केवल कानूनी विवाद और प्रशासनिक जटिलताएँ बढ़ती हैं, बल्कि SMC को राजस्व का भी नुकसान होता है। उन्होंने याद दिलाया कि 2019 में निर्माण अनुमतियाँ अधिक आसानी से और बिना किसी लंबी देरी के मिल जाती थीं, जिससे निगम को करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था। उन्होंने कहा कि तब से यह प्रक्रिया काफी धीमी हो गई है, जिससे एक सामान्य प्रशासनिक काम अब निवासियों और व्यवसाय मालिकों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया है।

ये आरोप निगम की प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं: क्या निगम की प्रवर्तन मशीनरी और राजस्व जुटाने के प्रयासों के साथ-साथ, वैध निर्माण अनुमतियाँ देने के लिए भी उतना ही कुशल सिस्टम मौजूद है? घर बनाने की चाह रखने वाले लोगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठान शुरू करने की योजना बना रहे उद्यमियों के लिए, समय पर अनुमति मिलना केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि एक कानूनी आवश्यकता है। आवेदकों का कहना है कि बिना किसी स्पष्ट समय-सीमा के आवेदनों को लंबित रखने से वे अनिश्चितता के शिकार हो जाते हैं, जबकि दूसरी ओर अनधिकृत निर्माण शहर के लिए एक चुनौती बने हुए हैं। अंदरूनी सूत्रों ने कहा, “अगर निगम अवैध निर्माण पर लगाम लगाना चाहता है, भ्रष्टाचार को रोकना चाहता है और अपने राजस्व हितों की रक्षा करना चाहता है, तो उसे एक पारदर्शी और समयबद्ध अनुमति प्रणाली लागू करनी चाहिए, जिसमें आवेदनों को संभालने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी स्पष्ट हो।”

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