
भारत को कभी “सोने की चिड़िया” कहा जाता था। सदियों तक यहां सोना, चांदी, मसाले और कपड़ा जैसी कीमती चीजों का व्यापार होता था। लेकिन जब ब्रिटिश शासन भारत में मजबूत हुआ, तो धीरे-धीरे देश की आर्थिक संपत्ति ब्रिटेन की ओर जाने लगी।
ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर अंग्रेज भारत से कितना सोना और संपत्ति लेकर गए। इतिहासकारों के शोध इस सवाल का एक बड़ा संकेत देते हैं।
व्यापार से शुरू हुआ आर्थिक नियंत्रण
1600 के दशक में East India Company भारत में व्यापार के लिए आई थी। शुरुआत में यह केवल व्यापार करती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने भारत के कई हिस्सों पर राजनीतिक नियंत्रण भी हासिल कर लिया।
इसके बाद भारत से कच्चा माल सस्ते में ब्रिटेन भेजा जाने लगा और वहां बने उत्पाद भारत में बेचे जाने लगे। इससे भारत की आर्थिक व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा।
इतिहासकारों का अनुमान
भारतीय मूल के इतिहासकारों के अनुसार 1765 से 1938 के बीच ब्रिटेन ने भारत से करीब 9.2 ट्रिलियन पाउंड का खजाना लूटा था जो आज की कीमत के हिसाब से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति निकाली।
हालांकि यह सिर्फ सोना नहीं था बल्कि इसमें कर, व्यापार से हुई कमाई, कच्चे माल और अन्य आर्थिक संसाधनों की कीमत भी शामिल है।
सोना और धातुएं
इतिहासकारों के अनुसार औपनिवेशिक काल में भारत से बड़ी मात्रा में सोना और चांदी भी ब्रिटेन पहुंची। उस समय भारत में कर वसूली, व्यापार और संसाधनों के जरिए ब्रिटिश प्रशासन को भारी आर्थिक लाभ मिलता था। यह संपत्ति अक्सर ब्रिटेन भेजी जाती थी जिससे वहां की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई।
भारत की अर्थव्यवस्था
ब्रिटिश शासन से पहले भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था। कुछ अध्ययनों के अनुसार 18वीं शताब्दी की शुरुआत में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20–25 प्रतिशत तक थी।
लेकिन औपनिवेशिक काल के अंत तक यह हिस्सा काफी कम हो गया। इतिहासकार इसे “धन के बहिर्गमन” यानी Drain of Wealth की नीति से जोड़ते हैं।
इतिहासकारों की अलग-अलग राय
हालांकि इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से बड़ी मात्रा में संपत्ति बाहर गई। लेकिन इस संपत्ति का सटीक आंकड़ा क्या था इस पर अलग-अलग शोध और अनुमान मौजूद हैं।
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