अजब-गजब: हिमालय की गोद में बसा नेपाल अपनी खूबसूरत वादियों के साथ-साथ कुछ अनोखी और कम सुनी जाने वाली परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। ऐसी ही एक परंपरा ‘पांचाली प्रथा’ है, जिसे आसान भाषा में समझें तो ‘एक महिला की शादी एक ही परिवार के कई भाइयों से’ कर दी जाती है। यह परंपरा सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हुए हैं।
कहां पाई जाती है यह परंपरा?
नेपाल के हुमला जिले के दूर-दराज पहाड़ी इलाकों में रहने वाला न्यिनबा समुदाय आज भी इस प्रथा को निभा रहा है। ये लोग चार छोटे-छोटे गांवों में रहते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘धूप वाली ढलान पर बसे गांव’ कहा जाता है। ये गांव समुद्र तल से करीब 2,500 से 3,300 मीटर की ऊंचाई पर बसे हैं। यहां का जीवन बहुत कठिन ना आसान खेती, ना ही अच्छे संसाधन है। ऐसे हालात में लोगों को हर फैसले के पीछे सोच-समझकर कदम उठाना पड़ता है।
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क्यों अपनाई गई यह प्रथा?
इस परंपरा का सबसे बड़ा कारण जमीन और संपत्ति को बचाना है। अगर परिवार के हर भाई की अलग-अलग शादी हो जाए, तो जमीन कई हिस्सों में बंट जाती है। छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी जमीन से खेती करना मुश्किल हो जाता है और परिवार की आमदनी कम हो जाती है। इसी समस्या से बचने के लिए परिवार के सभी भाइयों की शादी एक ही महिला से कर दी जाती है। इससे जमीन बंटती नहीं और परिवार आर्थिक रूप से मजबूत बना रहता है।
कैसे चलता है परिवार?
इस व्यवस्था में सबसे बड़े भाई को परिवार का मुखिया माना जाता है। उसी के साथ औपचारिक रूप से शादी होती है, लेकिन पत्नी पूरे परिवार की मानी जाती है। घर के फैसले लेने का अधिकार बड़े भाई के पास होता है। काम का बंटवारा भी तय होता है कोई खेती करता है, तो कोई व्यापार या पशुपालन संभालता है। सभी भाई मिलकर परिवार चलाते हैं, जिससे जिम्मेदारी बंट जाती है और काम आसान हो जाता है।
कैसे तय होती है बच्चों की जिम्मेदारी?
इस परंपरा में बच्चों को किसी एक पिता से नहीं जोड़ा जाता। बच्चे पूरे परिवार के माने जाते हैं। उनकी परवरिश की जिम्मेदारी भी सभी भाई मिलकर निभाते हैं। इससे परिवार में विवाद की संभावना बहुत कम हो जाती है।
महिलाओं की भूमिका
महिलाएं घर के कामों के साथ-साथ खेती में भी योगदान देती हैं। वहीं पुरुष लोग पशुपालन, व्यापार और अन्य कठिन काम करते हैं। यहां के लोग जौ, बाजरा और आलू उगाते हैं और साथ ही नमक और ऊन का व्यापार भी करते हैं।
क्या कहता है कानून?
नेपाल सरकार ने 1963 में इस तरह की बहुपतित्व प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन हुमला जैसे दूरस्थ इलाकों में इसका असर ज्यादा नहीं पड़ा। आज भी यह परंपरा वहां के लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है।
परंपरा या मजबूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में जीने का एक तरीका भी है, जहां संसाधन सीमित हों, वहां लोग अपने तरीके से समाधान खोजते हैं और न्यिनबा समुदाय की यह प्रथा उसी का एक उदाहरण है।
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