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105 कैरेट का वो भारतीय हीरा, जिसे लेकर छिड़ी थी जंग

Kohinoor diamond history

Kohinoor diamond history

दुनिया के सबसे चर्चित हीरों में शामिल 105 कैरेट का कोहिनूर आज भी इतिहास, सत्ता और विरासत की बहस का केंद्र बना हुआ है। भारत में इसे सिर्फ एक रत्न नहीं बल्कि गौरव और संघर्ष की निशानी के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि इसे लेकर कई बार राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़े हुए।

क्या है कोहिनूर की कहानी?
कोहिनूर हीरा मूल रूप से भारत की गोलकुंडा खदानों से निकला माना जाता है। शुरुआती दौर में इसका वजन करीब 186 कैरेट बताया जाता है। बाद में इसे तराशा गया और इसका वर्तमान वजन लगभग 105.6 कैरेट रह गया।

इतिहासकारों के अनुसार यह हीरा कई शासकों के हाथों से गुजरता हुआ मुगल दरबार तक पहुंचा। बाद में यह अफगान और सिख शासकों के पास रहा। 19वीं सदी में पंजाब के तत्कालीन शासक महाराजा दलीप सिंह से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने कब्जे में ले लिया।

ब्रिटेन कैसे पहुंचा कोहिनूर?
1849 में पंजाब के विलय के बाद 10 वर्षीय महाराजा दलीप सिंह को संधि के तहत कोहिनूर ब्रिटिश हुकूमत को सौंपना पड़ा। इसके बाद यह हीरा इंग्लैंड भेज दिया गया। 1850 में इसे महारानी विक्टोरिया को प्रस्तुत किया गया।

आज यह हीरा ब्रिटेन के शाही आभूषण संग्रह का हिस्सा है और लंदन के टॉवर में प्रदर्शित किया जाता है। यह Tower of London में रखे क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है।

क्यों छिड़ी जंग?
कोहिनूर को लेकर भारत समेत कई देशों ने समय-समय पर दावा किया है। भारत का तर्क है कि यह औपनिवेशिक दौर में जबरन लिया गया था इसलिए इसे वापस किया जाना चाहिए।

ब्रिटेन की सरकार का कहना है कि यह कानूनी संधि के तहत प्राप्त हुआ था और इसे लौटाने का सवाल नहीं उठता। यही वजह है कि कोहिनूर का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय बनता रहा है।

भारत ने वापसी की मांग की?
आजादी के बाद कई बार भारत सरकार ने कोहिनूर की वापसी की मांग उठाई। संसद में भी इस पर चर्चा हो चुकी है। हालांकि ब्रिटेन ने हर बार इसे लौटाने से इनकार किया है।

कोहिनूर आज ब्रिटेन के शाही मुकुट का हिस्सा है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बहस का प्रतीक बन चुका है। 105 कैरेट का कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं बल्कि इतिहास, विरासत और राष्ट्रीय पहचान का सवाल है। इसकी चमक आज भी बरकरार है लेकिन इसके मालिकाना हक को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ है।

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