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Caste Census : इस दिन से शुरू होगी जातीय जनगणना, इन 4 राज्यों से होगी शुरुआत

नेशनल डेस्क : भारत में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने 1 मार्च 2027 से देशभर में जनगणना शुरू करने की घोषणा की है। यह जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी और खास बात यह है कि इसमें पहली बार जातीय गणना को भी शामिल किया गया है। सरकार का यह फैसला सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…

पहाड़ी राज्यों में पहले होगी शुरुआत

आपको बता दें कि जनगणना की शुरुआत कुछ पहाड़ी और कठिन भौगोलिक इलाकों से की जाएगी, जिनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इन 4 राज्यों में जनगणना प्रक्रिया 1 अक्टूबर 2026 से आरंभ होगी। इन इलाकों में मौसम की कठिन परिस्थितियों और दुर्गम स्थानों के कारण, हर बार की तरह इस बार भी पहले जनगणना करवाई जाएगी ताकि मार्च 2027 तक देश के अन्य हिस्सों में समय पर कार्य शुरू हो सके।

दो चरणों में होगी जनगणना

इस बार की जनगणना दो अलग-अलग चरणों में की जाएगी:

-पहला चरण में होगी सामान्य जनगणना, जिसमें आबादी, परिवार की जानकारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएंगे।

-दूसरे चरण में होगी जातीय जनगणना, जिसमें लोगों की जातियों से जुड़ी सूचनाएं दर्ज की जाएंगी। यह स्वतंत्र भारत में पहली बार होगा जब सभी जातियों के विस्तृत आंकड़े एक साथ इकठ्ठा किए जाएंगे।

जातीय जनगणना का महत्व

सरकार का मानना है कि जातीय जनगणना से यह समझने में मदद मिलेगी कि किस जाति या वर्ग की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति कैसी है। इससे विभिन्न समुदायों के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं को और अधिक लक्ष्य आधारित और प्रभावी बनाया जा सकेगा। पिछड़े वर्गों को अधिक न्याय मिल सकेगा और संसाधनों का बेहतर वितरण किया जा सकेगा।

किस राज्यों में पहले होगी जातीय गणना?

सूत्रों के अनुसार, जातीय जनगणना की शुरुआत चार राज्यों में पहले की जाएगी। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। हालांकि इन राज्यों के नाम अभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुए हैं, लेकिन संकेत हैं कि यह वे राज्य हो सकते हैं जहाँ सामाजिक-आर्थिक विविधता और जातिगत मुद्दे अधिक संवेदनशील हैं।

भारत की आगामी जनगणना केवल संख्या गिनने की कवायद नहीं रहेगी, बल्कि यह समाज की गहराई से समझ और बेहतर नीति निर्माण का माध्यम बनेगी। पहली बार की जा रही जातीय जनगणना से सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की दिशा में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। यह कदम भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों को और मजबूत करेगा।

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