नई दिल्ली : भारत ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है, जिसे कोई भी नहीं भर सकता। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का निधन न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के नेताओं और लोगों के लिए एक बड़ी क्षति है। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, हर राजनीतिक दल और देशवासी के दिलों में डॉ. मनमोहन सिंह के लिए गहरा सम्मान है। उनकी कार्यशैली, ईमानदारी और देश के प्रति समर्पण को हमेशा याद किया जाएगा। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वित्त मंत्री बनने से पहले वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के चेयरमैन थे। उनकी ईमानदारी और काम करने के तरीकों ने उन्हें एक बेहतरीन अधिकारी बना दिया था। लेकिन उनके लिए राजनीति का रास्ता एक कॉल से खुला। जब पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने एक कॉल के जरिए मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाने का निर्णय लिया। यह कदम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, क्योंकि मनमोहन सिंह ने 1991 में देश के लिए कई साहसिक कदम उठाए, जो आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं। आइए जानते है इस पूरी खबर को विस्तार से…

1991 की रात और एक महत्वपूर्ण फोन कॉल
यह कहानी है, कैसे डॉ. मनमोहन सिंह को भारत के वित्त मंत्री बनने का मौका मिला और उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए साहसिक कदम उठाए। 1991 में, डॉ. मनमोहन सिंह नीदरलैंड से भारत लौटे थे और थके हुए थे, इसलिए उन्होंने सोने का निर्णय लिया। उस रात उनके कमरे की लाइट बंद हो चुकी थी और वह सो चुके थे। लेकिन अचानक देर रात उनके फोन की घंटी बजी। उनके दामाद विजय तन्खा ने फोन उठाया और दूसरी ओर से आवाज आई, “मैं पी.सी. एलेक्जेंडर बात कर रहा हूं।” विजय तन्खा को यह नाम सुनते ही समझ में आ गया कि यह कोई महत्वपूर्ण बात होगी, क्योंकि पी.सी. एलेक्जेंडर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के करीबी सहयोगी थे।
एलेक्जेंडर का आग्रह और डॉ. सिंह का जवाब
एलेक्जेंडर ने विजय तन्खा से अनुरोध किया कि वह डॉ. सिंह को जगाकर एक जरूरी बात बताएं। विजय तन्खा ने डॉ. सिंह को उठाया और पूरी बात बताई। इसके कुछ घंटों बाद डॉ. सिंह और पी.सी. एलेक्जेंडर की मुलाकात हुई, जहां उन्हें बताया गया कि प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव उन्हें भारत का वित्त मंत्री बनाना चाहते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह उस समय UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के चेयरमैन थे और उन्हें राजनीति का कोई खास अनुभव नहीं था। इसलिए, उन्होंने पी.सी. एलेक्जेंडर की बातों को शुरुआत में गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव इस प्रस्ताव को लेकर काफी गंभीर थे और चाहते थे कि मनमोहन सिंह उनका ऑफर स्वीकार करें।
शपथ ग्रहण और वित्त मंत्री का पद
हालांकि, 21 जून 1991 को डॉ. सिंह अपने कार्यालय में काम कर रहे थे, जब उन्हें कहा गया कि वह घर जाकर कपड़े बदलें, क्योंकि उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होना है। डॉ. सिंह को देखकर सभी हैरान रह गए, क्योंकि किसी ने भी नहीं सोचा था कि पीएम राव अपनी टीम में एक नए चेहरे को शामिल करेंगे। शपथ ग्रहण के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री का पद सौंपा जाएगा।
आर्थिक संकट के दौरान भारत को बचाने वाला कदम
भारत का इतिहास 1991 के आर्थिक संकट के बिना अधूरा है। जब मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री की कुर्सी संभाली , भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल 6 अरब डॉलर रह गया था। उस समय भारत के पास केवल दो हफ्ते का विदेशी मुद्रा भंडार बचा हुआ था। यह स्थिति इतनी गंभीर थी कि देश दिवालिया होने के कगार पर था। उस समय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव थे और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह। यह वह समय था जब भारत को किसी स्थिर और दूरदर्शी नेतृत्व की जरूरत थी। मनमोहन सिंह ने इस संकट से निपटने के लिए कई अहम कदम उठाए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से कर्ज लेने के साथ-साथ कई आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने विदेशी निवेश को आकर्षित करने, व्यापार नीति में बदलाव, और उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए कई साहसिक कदम उठाए। उनका प्रमुख कदम था भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन, जिसके बाद विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ा और देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।
आर्थिक सुधारों की दिशा में मनमोहन सिंह का योगदान
मनमोहन सिंह ने भारत में 1991 में जो आर्थिक सुधार लागू किए, वे आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने निजीकरण, वैश्वीकरण और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली।उनके नेतृत्व में किए गए सुधारों से भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और देश ने दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके समय में भारतीय अर्थव्यवस्था ने तेज गति से विकास किया और वह भारत के सबसे प्रभावशाली वित्त मंत्रियों में से एक माने गए।
डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में हमेशा याद रखा जाएगा। उनका कार्यकाल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था, विशेष रूप से 1991 के आर्थिक संकट के दौरान उनके द्वारा उठाए गए साहसिक कदमों ने भारत को उस मुश्किल दौर से बाहर निकाला। आज, उनके निधन पर पूरा देश शोक व्यक्त कर रहा है, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्यों और उनकी दूरदृष्टि को हमेशा सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद किया जाएगा।