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RSS ने कभी संविधान को स्वीकार नहीं किया, जयराम रमेश का बड़ा बयान

नेशनल डेस्क: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने कभी भी भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना था कि आरएसएस ने हमेशा संविधान के निर्माताओं पर हमला किया है और यह दावा किया है कि संविधान मनुस्मृति से प्रेरित नहीं है।

यह बयान जयराम रमेश ने आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले द्वारा की गई टिप्पणी के जवाब में दिया। होसबोले ने गुरुवार को आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर एक कार्यक्रम में कहा था कि संविधान में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” जैसे शब्द जबरन डाले गए थे और इन शब्दों पर फिर से विचार करने की जरूरत है।

RSS ने कभी भी संविधान को स्वीकार नहीं किया
जयराम रमेश ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और ट्वीट किया, “आरएसएस ने कभी भी भारत के संविधान को स्वीकार नहीं किया। आरएसएस और भाजपा ने बार-बार एक नया संविधान बनाने की मांग की है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी यह अभियान देखा गया था, लेकिन भारतीय जनता ने इस पर विचार नहीं किया। फिर भी आरएसएस के लोग संविधान के मूल ढांचे को बदलने की मांग कर रहे हैं।”

कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि आरएसएस के लोग डॉ. भीमराव अंबेडकर, पंडित नेहरू और संविधान के अन्य निर्माताओं पर हमला करते आए हैं। उनका कहना था कि संविधान में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द डाले जाने के बाद भी आरएसएस ने इन शब्दों का विरोध किया। जयराम रमेश ने 1976 के संविधान संशोधन को भी उठाया, जिसमें प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष”, “समाजवादी” और “अखंडता” शब्द डाले गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को याद दिलाया 
सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को चुनौती देने के बाद कहा था कि संविधान को संशोधित करने की शक्ति पूरी तरह से संसद के पास है और इसमें कोई खामी नहीं है। उन्होंने 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी याद दिलाया, जिसमें यह कहा गया था कि धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद संविधान की मूल विशेषताएं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि आपातकाल के बाद जब इन शब्दों को संविधान में डाला गया था, तब संसद ने इन पर पूरी तरह से विचार किया था।

आरएसएस का बयान 
इससे पहले, आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने आपातकाल को केवल सत्ता का दुरुपयोग नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमला बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि आपातकाल लगाने वालों ने कभी माफी नहीं मांगी और उन्होंने संविधान और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाया। यह पूरी बहस संविधान के प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्दों को लेकर हो रही है, जिनकी आरएसएस और भाजपा द्वारा बार-बार आलोचना की जाती रही है।

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