नेशनल डेस्क: शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता संजय राउत ने 1975 में लागू किए गए आपातकाल का बचाव करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र के लिए “काला दिन” नहीं था, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। राउत ने केंद्र सरकार द्वारा आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
संजय राउत का बयान
राउत ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “लोगों का कहना है कि आपातकाल लोकतंत्र और संविधान के लिए काला दिन था, लेकिन हम ऐसा नहीं मानते। बालासाहेब ठाकरे ने खुद आपातकाल का समर्थन किया था। महात्मा गांधी की हत्या वाला दिन, राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव में युद्ध रोकने का दिन, ये हमारे लिए काले दिन थे, लेकिन आपातकाल नहीं।”
नेहरू-गांधी परिवार का बचाव
राउत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान पर भी पलटवार किया, जिसमें शाह ने नेहरू-गांधी परिवार को लोकतंत्र को कमजोर करने वाला “शाही परिवार” कहा था। राउत ने कहा, “पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी ने जो बलिदान दिया, उन्होंने अपने घर तक बेच दिए थे। क्या व्यापारी ऐसा कर सकते हैं?” उन्होंने यह भी कहा, “महात्मा गांधी का कोई शाही परिवार नहीं था, क्या आप समझते हैं? राजनीति में सिर्फ पैसा और ताकत से कुछ नहीं होता, इतिहास को भी समझना चाहिए।”
प्रधानमंत्री मोदी का बयान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 25 जून को आपातकाल को लेकर कांग्रेस की आलोचना की और इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का “सबसे काला अध्याय” बताया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की और कहा कि इससे युवा पीढ़ी को आपातकाल के बारे में जागरूक किया जाएगा, ताकि ऐसी घटनाएं भविष्य में कभी न दोहराई जाएं।
आपातकाल का प्रभाव
अमित शाह ने 1975 से 1977 तक चले आपातकाल को “देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और कहा कि इस दौरान देश को जेलखाना बना दिया गया था, अदालतें बहरा हो गई थीं, और लेखकों की आवाज़ को चुप करा दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि बुरी घटनाओं को याद रखना जरूरी है ताकि हम भविष्य में उनसे बच सकें। संजय राउत ने 1975 के आपातकाल को लेकर अपनी पार्टी और बालासाहेब ठाकरे का समर्थन व्यक्त किया, जबकि भाजपा नेताओं ने इसे लोकतंत्र का अंधकारमय दौर करार दिया है। यह मुद्दा अब भारतीय राजनीति में फिर से गरमाता जा रहा है।

