नेशनल डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को देशवासियों से ‘गुरु चरण यात्रा’ में भाग लेने और ‘जोड़े साहिब’ (श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और माता साहिब कौर जी के पवित्र जूते) के दर्शन करने की अपील की है। यह आध्यात्मिक यात्रा 23 अक्टूबर से शुरू होकर 1 नवंबर तक चलेगी। इसमें नई दिल्ली के गुरुद्वारा मोती बाग साहिब से लेकर बिहार के तख्त श्री पटना साहिब तक यह पवित्र जोड़े साहिब ले जाए जाएँगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह यात्रा गुरु गोबिंद सिंह जी और माता साहिब कौर जी के महान विचारों और शिक्षाओं से लोगों को जोड़ने का एक पवित्र प्रयास है। उन्होंने कहा, “मैं उन सभी लोगों से आग्रह करता हूँ कि जहाँ-जहाँ यह यात्रा पहुंचे, वहां जाकर जोड़े साहिब के दर्शन करें और आशीर्वाद प्राप्त करें।”
May the Guru Charan Yatra deepen our connect with the noble ideals of Sri Guru Gobind Singh Ji and Mata Sahib Kaur Ji. I urge people in the areas this yatra will cover to come and have Darshan of the holy ‘Jore Sahib’. https://t.co/GBBXL6vSnV
— Narendra Modi (@narendramodi) October 22, 2025
‘जोड़े साहिब’ श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और माता साहिब कौर जी के पवित्र जूते (चप्पल) हैं, जो 300 साल से भी ज्यादा समय से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के परिवार द्वारा संरक्षित किए गए थे। अब इन पवित्र अवशेषों को गुरु चरण यात्रा के तहत देश भर की संगत को दर्शन के लिए दिखाया जाएगा।
शुरुआत: 23 अक्टूबर – गुरुद्वारा मोती बाग साहिब, नई दिल्ली
समापन: 1 नवंबर – तख्त श्री पटना साहिब, बिहार
दिल्ली से शुरू होकर फरीदाबाद, आगरा, बरेली, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, फिर वाराणसी होते हुए सासाराम, और अंत में पटना पहुंचेगी।
पवित्र जोड़े साहिब के साथ चलेंगे। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, पंज प्यारे (पाँच प्यारे), और पारंपरिक सिख रीति-रिवाजों का पूरा पालन होगा। हर शहर में होंगे कीर्तन दरबार, लंगर सेवा, और संगत के लिए विशेष कार्यक्रम। हरदीप सिंह पुरी और उनके परिवार ने जोड़े साहिब को पंथ को सौंपने से पहले अपने घर पर अरदास की और फिर इसे दर्शन के लिए गुरुद्वारा मोती बाग साहिब में लाया गया, जहाँ 23 अक्टूबर की शाम 6 बजे से रात 11 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं।
यह यात्रा विश्व भर के सिख समुदाय के लिए एक अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक क्षण है, क्योंकि यह उन्हें अपने गुरुओं के वास्तविक, ऐतिहासिक अवशेषों से जुड़ने का दुर्लभ अवसर देती है।
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