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महबूबा मुफ्ती ने अमित शाह लिखा पत्र, यासीन मलिक मामले को लेकर कर दी ये बड़ी अपील

जम्मू-कश्मीर डेस्क: जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को शुक्रवार को एक पत्र लिखकर यासीन मलिक के मामले को “मानवीय दृष्टिकोण” से देखने की अपील की है। मुफ्ती ने कहा कि भले ही वह मलिक की राजनीतिक विचारधारा से असहमत हों, लेकिन हिंसा को छोड़कर शांति और राजनीतिक जुड़ाव की राह पर चलने के उनके साहस को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पत्र में क्या लिखा था?

मुफ्ती ने पत्र में कहा, “यासीन मलिक का मामला साधारण नहीं है। वह एक समय प्रतिरोध का प्रतीक थे, लेकिन उन्होंने हिंसा का त्याग कर राजनीतिक जुड़ाव और अहिंसक असहमति की राह अपनाई। इस परिवर्तन को नकारा नहीं किया जा सकता।” उन्होंने आगे कहा कि मलिक की यात्रा भारतीय राज्य के लिए कोई रहस्य नहीं है। 1994 में उन्होंने राजनीतिक और अहिंसक तरीके अपनाने का साहसिक निर्णय लिया था।

पत्र में मुफ्ती ने लिखा, “मलिक ने भारतीय एजेंसियों के साथ गुप्त समझौतों के माध्यम से अपने दृष्टिकोण में बदलाव किया। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों और विवादास्पद व्यक्तियों के साथ बातचीत की और गहरे विभाजित क्षेत्र में पुल बनाने का प्रयास किया।”

 

मुफ्ती का संदेश:

महबूबा मुफ्ती ने पत्र में यह भी कहा कि कश्मीर के लोग हमेशा हाशिए पर रहे हैं, और उनकी आवाज़ों को उन फैसलों से बाहर रखा जाता है जो उनके जीवन को प्रभावित करते हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र, विकास और स्थायी शांति के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने की आवश्यकता है। मुफ्ती ने कहा, “भारत को सामरिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नई रणनीति की आवश्यकता नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेताओं ने यह समझा कि स्थायी शक्ति संवाद से आती है, प्रभुत्व से नहीं।”

शांति और संवाद का महत्व:

महबूबा ने यह भी चेतावनी दी कि “शांति को चुनने वाले व्यक्ति के लिए हमेशा के लिए दरवाज़ा बंद करने से, सार्थक संवाद के लिए ज़रूरी नाज़ुक विश्वास टूट सकता है।” उन्होंने यह अपील की कि यासीन मलिक के मामले पर सहानुभूति और विचार किया जाए, क्योंकि ऐसा नहीं करने से कश्मीर में शांति और सुलह के लिए भविष्य में संघर्ष और अलगाव की स्थिति बनेगी।

यासीन मलिक का मामला:

यासीन मलिक को 2022 में यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत दोषी ठहराया गया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष किया था, लेकिन बाद में हिंसा का रास्ता छोड़कर राजनीतिक जुड़ाव की दिशा में कदम बढ़ाया।

एनआईए (National Investigation Agency) ने मलिक पर पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर में अशांति फैलाने का आरोप लगाया था। इस साल की शुरुआत में, जेकेएलएफ (Jammu Kashmir Liberation Front) पर पांच और वर्षों के लिए प्रतिबंध लगाया गया था।

केंद्रीय मंत्री से अपील:

महबूबा ने गृह मंत्री अमित शाह से अनुरोध किया कि वे यासीन मलिक के मामले को मानवीय दृष्टिकोण से देखें और उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए मामले की समीक्षा करें। उनका मानना है कि अगर शांति की राह पर चलने वाले किसी व्यक्ति के लिए हमेशा के लिए दरवाज़ा बंद कर दिया जाता है, तो यह बातचीत और सुलह की संभावनाओं को खत्म कर देगा।

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