नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए भारतीय सेना के अधिकारी को आत्मसमर्पण से छूट देने से मंगलवार को इनकार कर दिया। इस अधिकारी के वकील ने यह तर्क दिया था कि वह पाकिस्तान के खिलाफ हाल ही में हुए सैन्य अभियान “ऑपरेशन सिंदूर” का हिस्सा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस अधिकारी को गिरफ्तारी से संरक्षण की याचिका खारिज करते हुए उसे दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
मैंने ऑपरेशन सिंदूर में भाग लिया था: अधिकारी का तर्क
अधिकारी के वकील ने कोर्ट में कहा कि उनका मुवक्किल भारतीय सेना के ब्लैक कैट कमांडो में कार्यरत है और उसने ऑपरेशन सिंदूर में भाग लिया था। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में सेवा देने से आरोपी को अपने घर में दहेज हत्या करने से कोई छूट नहीं मिलती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह तथ्य कि वह सेना में सेवा दे चुका है, केवल यह दिखाता है कि वह अपनी पत्नी को गला घोंटकर मारने के लिए सक्षम था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आम तौर पर, अपराधों से संबंधित मामलों में आत्मसमर्पण से छूट दी जाती है, लेकिन दहेज हत्या जैसे गंभीर आरोपों में इस तरह की छूट नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने आरोपी अधिकारी की याचिका पर पंजाब राज्य को नोटिस जारी करने पर सहमति दी, लेकिन आत्मसमर्पण से कोई संरक्षण देने से मना कर दिया।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का निर्णय
आरोपी अधिकारी ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे आत्मसमर्पण से राहत देने से इनकार किया गया था। पहले पंजाब की एक अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दहेज हत्या के आरोप में दोषी ठहराया था। फिर, उसने उच्च न्यायालय में अपील की थी। उच्च न्यायालय ने उसकी सजा को निलंबित करते हुए उसे राहत दी थी, लेकिन पिछले महीने उसकी अपील खारिज कर दी और उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसे 10 साल की कठोर सजा सुनाई।

