नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें कांवड़ यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले होटल और भोजनालयों को अपने यहां क्यूआर कोड लगाने का निर्देश दिया गया था। इस क्यूआर कोड के जरिए तीर्थयात्री यह जान सकेंगे कि उस होटल या ढाबे का मालिक कौन है। कोर्ट ने कहा कि भोजनालयों को अपने लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र भी साफ़ तौर पर प्रदर्शित करने होंगे, जैसा कि कानून में अनिवार्य है।
आदेश की वैधता पर कोई फैसला नहीं लेंगे
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि फिलहाल यात्रा का अंतिम दिन है, इसलिए वे इस आदेश की वैधता पर कोई फैसला नहीं लेंगे। हालांकि अदालत ने यह साफ कर दिया कि सभी होटल और भोजनालय कानूनी नियमों के अनुसार अपने लाइसेंस और पंजीकरण के कागज़ ज़रूर दिखाएं। यानी, उन्हें अपने लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र सार्वजनिक रूप से डिस्प्ले करना ही होगा।
क्या है मामला?
कांवड़ यात्रा इस साल 11 जुलाई को शुरू हुई थी। यह सावन के पहले दिन से शुरू होती है और इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा से जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इस यात्रा में लोग मांसाहार नहीं करते, और इसी को देखते हुए, उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसमें यात्रा मार्ग पर चल रहे भोजनालयों को क्यूआर कोड लगाने के लिए कहा गया। उत्तराखंड सरकार ने भी यही नियम लागू किया।
पिछले हफ्ते नोटिस जारी कर मांगा था पक्ष
इस फैसले के खिलाफ शिक्षाविद अपूर्वानंद और अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने कहा कि इस तरह का आदेश धार्मिक या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है और यह प्रोफाइलिंग का मामला बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा था। फिलहाल, कोर्ट ने क्यूआर कोड वाले आदेश पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन यह स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई में आदेश की वैधता पर विचार किया जाएगा।

