
नई दिल्ली: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने हाल ही में एक बयान में कहा कि संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ (सेक्युलर) शब्द भारत की संविधानिक प्रकृति के अनुसार नहीं है। उन्होंने यह टिप्पणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले की उस मांग का समर्थन करते हुए दी, जिसमें उन्होंने संविधान की प्रस्तावना (Preamble) से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों पर दोबारा विचार करने की बात कही थी।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जब भारतीय संविधान बना था, तब इसमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल नहीं था, बल्कि इसे 1976 में आपातकाल (Emergency) के समय जोड़ा गया था। उन्होंने कहा, “धर्म का मतलब होता है सही और गलत में फर्क करना और सही को अपनाना। लेकिन ‘धर्मनिरपेक्ष’ होने का मतलब अगर यह है कि हमें सही-गलत से कोई मतलब नहीं है, तो यह व्यावहारिक नहीं है। ऐसा कोई जीवन में नहीं कर सकता। इसलिए यह शब्द संविधान की प्रकृति से मेल नहीं खाता।”
इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने RSS पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “RSS और भाजपा को संविधान नहीं, बल्कि मनुस्मृति चाहिए। उनका असली मकसद गरीबों और समाज के हाशिए पर पड़े लोगों से उनके अधिकार छीनना है और उन्हें फिर से गुलाम बनाना है।”राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (Twitter) पर लिखा, “आरएसएस-बीजेपी का असली एजेंडा संविधान को खत्म करना है। वे नहीं चाहते कि समाज के दबे-कुचले वर्गों को अधिकार मिले।”
यह विवाद उस समय फिर से तेज हुआ जब 26 जून को आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने एक कार्यक्रम में कहा कि “आपातकाल के दौरान संविधान में जबरदस्ती ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शब्द जोड़े गए थे, जिन पर अब फिर से विचार करने की जरूरत है।” उन्होंने आपातकाल को देश के लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा हमला बताया और कहा कि जिन्होंने आपातकाल लगाया, उन्होंने कभी इसके लिए देश से माफी नहीं मांगी। यह कार्यक्रम दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में हुआ, जिसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित किया गया था।
मेष: दिन शुभ रहेगा...