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ऊर्जा महंगी होने से इंडस्ट्री पर दबाव, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज की ग्रोथ घटी

energy cost impact industry manufacturing services growth decline

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भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर की आउटपुट ग्रोथ मार्च में कम हो गई है। इसकी वजह मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ना है। यह जानकारी मंगलवार को जारी हुए एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई डेटा में दी गई।

पीएमआई कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स, जो कि देश के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की स्थिति को दिखाता है, मार्च में 56.5 रहा है।

जब भी पीएमआई 50 से ऊपर होता है तो यह ग्रोथ को दिखाता है, जब भी यह इस स्तर से नीचे होता है तो आर्थिक गतिविधियों में गिरावट होती है।

एचएसबीसी की भारत में मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा, “घरेलू मांग में नरमी के कारण नए ऑर्डरों में गिरावट आई, जो तीन साल से अधिक समय में सबसे धीमी गति से बढ़े, हालांकि निर्यात के नए ऑर्डरों में रिकॉर्ड वृद्धि हुई। लागत का दबाव बढ़ा, लेकिन कंपनियां मार्जिन कम करके इस वृद्धि के कुछ हिस्से को वहन कर रही हैं।”

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कंपनियों ने संकेत दिया कि मध्य पूर्व युद्ध, अस्थिर बाजार स्थितियों और मुद्रास्फीति के दबाव ने विकास को धीमा कर दिया। इनपुट लागत और विक्रय शुल्क में क्रमशः 45 और सात महीनों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई।

एसएंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों और सर्विसेज कंपनियों को दिए गए नए ऑर्डरों में भी धीमी वृद्धि हुई। कुल मिलाकर बिक्री में नवंबर 2022 के बाद से सबसे धीमी गति से वृद्धि हुई।

मार्च में समग्र स्तर पर बकाया कारोबार की मात्रा में लगातार चौथे महीने वृद्धि दर्ज की गई।

मैन्युफैक्चरिंग डेटा के मुताबिक, पिछली तिमाही के अंत में खरीद स्तर और खरीद के भंडार में और वृद्धि हुई। हालांकि, दोनों ही मामलों में वृद्धि दर फरवरी से धीमी हो गई।

पीएमआई डेटा के अनुसार, “कंपनियों ने अपने अतिरिक्त लागत भार का एक बड़ा हिस्सा वहन कर लिया, जैसा कि विक्रय मूल्यों में वृद्धि से पता चलता है, जो इनपुट लागतों की तुलना में काफी कम थी।”

एचएसबीसी के मुताबिक, भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियां आगामी 12 महीनों में उत्पादन स्तर में वृद्धि को लेकर आशावादी थीं। दक्षता में सुधार, विपणन अभियान और नए ग्राहकों की पूछताछ कुछ ऐसे कारण थे जो कंपनियों ने अपने सकारात्मक आकलन के लिए बताए हैं।

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