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H1B वीजा की फीस बढ़ने से भारतीय IT कंपनियों को झटका! जानें कितना हुआ नुक्सान

नई दिल्ली: अमेरिकी प्रशासन द्वारा H-1B वीजा आवेदन फीस में $100,000 तक की भारी बढ़ोतरी की घोषणा ने वैश्विक टेक इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। हालांकि यह बदलाव एक बड़ी वित्तीय चुनौती जैसा प्रतीत हो रहा है, लेकिन ब्रोकरेज हाउसों और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय IT कंपनियों पर इसका असर अपेक्षाकृत सीमित रहेगा।

यह नया शुल्क वित्त वर्ष 2027 (FY27) से लागू होगा और केवल नए वीजा आवेदनों पर प्रभाव डालेगा। मौजूदा वीजा धारक और रिन्युअल केस इस वृद्धि से बाहर रहेंगे, जिससे इसका तात्कालिक प्रभाव कम होगा।

भारतीय कंपनियां पहले से तैयार

ब्रोकरेज विश्लेषणों के अनुसार, भारतीय IT कंपनियों ने पिछले कुछ वर्षों में अपने ऑपरेशनल मॉडल को अमेरिकी वीजा नीति के बदलावों के अनुसार ढाल लिया है। कंपनियों ने स्थानीय प्रतिभा की भर्ती, सब-कॉन्ट्रैक्टिंग और ऑफशोर डिलीवरी जैसे विकल्पों को बढ़ावा देकर H-1B वर्कफोर्स पर निर्भरता काफी घटा दी है।

CLSA का आकलन है कि अगर कोई कंपनी बढ़ी हुई फीस को पूरी तरह खुद वहन करती है, तो FY27 में उसकी आय पर 6% तक असर पड़ सकता है। हालांकि, मुनाफे पर प्रभाव केवल 1-3% के बीच रहेगा।

नई रणनीतियों से होगी भरपाई

ICICI सिक्योरिटीज ने यह स्पष्ट किया कि कंपनियों को 100 बेसिस प्वाइंट्स तक मार्जिन में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन वो स्टाफिंग मॉडल में बदलाव कर इससे उबर सकती हैं।

वहीं, मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज का कहना है कि स्थानीयकरण और डिलीवरी ऑप्शन्स का विस्तार कंपनियों को इस नई चुनौती से निपटने में सक्षम बनाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि H-1B वीजा के लिए सबसे ज़्यादा आवेदन अब भारतीय कंपनियों की बजाय अमेरिकी टेक जायंट्स जैसे कि गूगल, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा से आ रहे हैं।

नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज का मानना है कि कंपनियां कुशल स्टाफिंग और लागत-कुशल समाधान अपनाकर बढ़ती लागत को न्यूट्रलाइज करेंगी। उनका जोर इस बात पर है कि यह नीतिगत बदलाव दीर्घकालीन रूप से व्यवसाय की दिशा को नहीं बदलेंगे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

टेक इंडस्ट्री विशेषज्ञों के अनुसार, यह वीजा फीस वृद्धि भारतीय IT कंपनियों के लिए वॉर्निंग साइन जरूर है, लेकिन एक तबाही नहीं। पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने विकेन्द्रित भर्ती, ऑटोमेशन, और AI आधारित ऑपरेशन्स जैसे विकल्पों पर निवेश बढ़ाया है, जिससे H-1B पर निर्भरता लगातार घट रही है।

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