नई दिल्ली: ऑनलाइन गोल्ड खरीदने का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। आज फोनपे, पेटीएम, गूगल पे से लेकर तनिष्क जैसे बड़े ब्रांड भी डिजिटल गोल्ड बेच रहे हैं। 10 या 20 रुपये से शुरू होने वाला निवेश लोगों को काफी आकर्षित करता है। घर बैठे सोना खरीदने बेचने की सुविधा और स्टोरेज का झंझट न होना इसकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन जितना आसान यह तरीका दिखता है, उतना ही जोखिम भरा यह तब हो जाता है जब आप बिना सोचे समझे निवेश कर देते हैं।

क्यों बढ़ रहा डिजिटल गोल्ड का क्रेज?
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सिर्फ कुछ क्लिक में सोना खरीदने की सुविधा ने लाखों नए निवेशकों को इस विकल्प की ओर खींचा है। छोटे अमाउंट से निवेश शुरू किया जा सकता है और कभी भी बेचकर पैसा निकालने की आज़ादी भी मिलती है। स्टोरेज की चिंता नहीं कंपनियां खुद गोल्ड को सुरक्षित वॉल्ट में रखती हैं।
फिर भी, यह सुविधा तभी सुरक्षित है जब प्लेटफॉर्म विश्वसनीय हो और कंपनी पारदर्शिता बनाए रखे।
सबसे बड़ी गलती: हर प्लेटफॉर्म पर भरोसा करना
कई ऐप और वॉलेट सिर्फ बिचौलिया होते हैं उनके पास खुद का गोल्ड स्टॉक नहीं होता। ऐसी स्थिति में प्लेटफॉर्म बंद होने, सर्वर फेल होने या कंपनी विवाद में उलझने पर आपका पैसा फंस सकता है।
निवेश से पहले यह जानना बेहद जरूरी है कि गोल्ड प्रदाता कंपनी कौन है MMTC-PAMP, Augmont या SafeGold जैसी रेप्यूटेड कंपनियों को ही प्राथमिकता दें। SEBI भी साफ कर चुका है कि डिजिटल गोल्ड किसी रेगुलेशन के तहत नहीं आता। इसका मतलब यह है कि अगर कोई प्लेटफॉर्म डिफॉल्ट हो जाए तो निवेशक को नियामक से सुरक्षा नहीं मिलेगी।
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टाइम लिमिट और चार्जेस को हल्के में न लें
कई प्लेटफॉर्म डिजिटल गोल्ड को सिर्फ 5 साल तक ही वॉल्ट में रखने की अनुमति देते हैं। इसके बाद या तो फिज़िकल डिलीवरी लेनी पड़ती है या गोल्ड बेचना अनिवार्य हो जाता है। फिजिकल डिलीवरी लेते समय मेकिंग चार्ज, जीएसटी, डिलीवरी कॉस्ट जैसे कई खर्च जुड़ जाते हैं, जिससे रिटर्न काफी घट जाता है। इसीलिए डिजिटल गोल्ड में पैसा लगाने से पहले तय करें कि आपका लक्ष्य शॉर्ट-टर्म है या लॉन्ग-टर्म। लंबी अवधि के लिए गोल्ड ETF या सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड ज्यादा सुरक्षित विकल्प माने जाते हैं, क्योंकि वे सरकार द्वारा समर्थित होते हैं और ब्याज भी देते हैं।