नई दिल्ली: भारत रूस की मार्केट में अपना बुलंद कदम रखने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि अब देश केवल तेल और फर्टिलाइजर के आयात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फार्मा, इंजीनियरिंग, कृषि और सी-फूड जैसे कई प्रमुख सेक्टर्स में निर्यात को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है। इसके लिए भारत और ईएईयू (Eurasian Economic Union) के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
सरकार का यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा अब लगभग 59 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। मतलब, भारत रूस से काफी सामान खरीद रहा है, लेकिन निर्यात उतना नहीं हो पा रहा। इस असंतुलन को कम करने के लिए भारतीय प्रशासन ने रूस से व्यापार में आने वाली नॉन-टैरिफ रुकावटों को हटाने पर जोर दिया है।
65 से अधिक नॉन-टैरिफ रुकावटों की सूची तैयार
भारत ने रूस को 65 से अधिक नॉन-टैरिफ रुकावटों की पूरी लिस्ट सौंप दी है। फार्मा सेक्टर में भी चार प्रमुख दिक्कतें सामने आई हैं: दवाओं का रजिस्ट्रेशन कठिन होना, क्लिनिकल ट्रायल की सख्ती, सीमित बाजार तक पहुंच, और दवाओं की कीमत तय करने के जटिल नियम। ये सभी मुद्दे भारत जैसे बड़े दवा निर्यातक देश के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।
रूस में भारतीय उत्पादों के लिए अवसर
ईएईयू की मार्केट भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME), के लिए कई नए अवसर खोल सकती है। फिलहाल, रूस के आयात में भारत का हिस्सा केवल 2.3% है। इस नए समझौते के माध्यम से भारत दवाइयां, केमिकल, इंजीनियरिंग सामान, मशीनरी, गाड़ियां, कृषि उत्पाद और सी-फूड जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाना चाहता है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि सोना और कीमती धातुएं इस व्यापार समझौते में शामिल नहीं होंगी, ताकि आयात संतुलन बिगड़े नहीं।
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एफटीए वार्ता में अहम मुद्दे
ईएईयू के साथ चल रही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वार्ता में टैरिफ, कस्टम्स प्रशासन, तकनीकी मानक, सैनिटरी–फाइटोसैनिटरी नियम, प्रतिस्पर्धा और ई-कॉमर्स जैसे विषय शामिल हैं। सरकार ने उद्योग जगत से शिपिंग, कस्टम्स डॉक्यूमेंटेशन और बैंकिंग चुनौतियों पर फीडबैक भी मांगा है। इसके अलावा, चूंकि ईएईयू समझौतों में सेवा क्षेत्र शामिल नहीं होता, भारत रूस के साथ अलग से एक सर्विस सेक्टर समझौते पर भी विचार कर रहा है।
जानें क्या होगा इसका नतीजा
भारत का यह कदम न सिर्फ रूस के साथ व्यापारिक संतुलन बनाने में मदद करेगा, बल्कि भारतीय उद्योगों को नए बाजारों तक पहुंचने का मौका भी देगा। इस रणनीति से फार्मा, इंजीनियरिंग और कृषि जैसे सेक्टरों में निर्यात में तेज़ी आने की संभावना है।
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