Last Updated: November 5, 2026

Dainik Savera Times Logo

UP में मक्के का रकबा 113 प्रतिशत बढ़ा, कुपोषण से हो सकेगी निर्णायक जंग

May 3, 2023

UP में मक्के का रकबा 113 प्रतिशत बढ़ा, कुपोषण से हो सकेगी निर्णायक जंग

लखनऊ: मां की तरह बच्चों को कुपोषण से बचाने वाली अनाज की रानी मक्का की खिलखिलाहट बढ़ गई है। काबोर्हाइड्रेड, वसा और विटामिन से भरपूर मक्के के रकबे में 113 प्रतिशत का उछाल आया है। ढोकला, बेबीकार्न और पॉपकॉर्न के रूप में खाए जाने वाला मक्का के सेवन से कुपोषित परिवार फल फूल सकेंगे। यूपी सरकार ने मक्के का उत्पादन 2027 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। फिलहाल 2021-2022 में मक्के का उत्पादन 14.67 लाख मेट्रिक टन था। तय अवधि में इसे बढ़ाकर 27.30 लाख मीट्रिक टन करने का लक्ष्य है।

इसके लिए रकबा बढ़ाने के साथ प्रति हेक्टेयर प्रति कुंतल उत्पादन बढ़ाने पर भी बराबर का जोर होगा। जायद के मौजूदा सीजन से इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। प्रदेश के किसानों ने संकल्प के अनुरूप मक्के की बोआई का रकबे में खासी बृद्धि की है। जायद की प्रमुख फसलों के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस सीजन के लिए सरकार का लक्ष्य 1.71 लाख हेक्टेयर पर मक्के की बोआई का लक्ष्य था। इसकी तुलना में बोआई 1.93 लाख हेक्टेयर रकबे में हुई यह लक्ष्य का करीब 113 फीसद है। मक्के की खेती का रकबा बढाने एवं सरकार की ओर से 2027 तक इसकी उपज दोगुना करने के लक्ष्य के पीछे मक्के का बहुपयोगी और कई खूबियों से लैश होना है।

बात चाहे पोषक तत्वों की हो या उपयोगिता की। बेहतर उपज की बात करें या सहफसली खेती या औद्योगिक प्रयोग की, हर मौसम (रबी, खरीफ एवं जायद) और जलनिकासी के प्रबंधन वाली हर तरह की भूमि में होने वाले मक्के का जवाब नहीं। मालूम हो कि मक्के का प्रयोग ग्रेन बेस्ड इथेनॉल उत्पादन करने वाली औद्योगिक इकाइयों, कुक्कुट एवं पशुओं के पोषाहार, दवा, कास्मेटिक, गोद, वस्त्र, पेपर और एल्कोहल इंडस्ट्री में भी होता है। इसके अलावा मक्के को आटा, ढोकला, बेबी कार्न और पाप कार्न के रूप में तो खाया ही जाता है।

किसी न किसी रूप में ये हर सूप का अनिवार्य हिस्सा है। आने वाले समय में बहुपयोगी होने की वजह से मक्के की मांग भी बढ़ेगी। इस बढ़ी मांग का अधिकतम लाभ प्रदेश के किसानों को हो इसके लिए सरकार मक्के की खेती के प्रति किसानों को लगातार जागरूक कर रही है। उनको खेती के उन्नत तौर तरीकों की जानकारी देने के साथ सीड रिप्लेसमेंट (बीज प्रतिस्थापन) की दर को भी बढ़ा रही है। किसानों को मक्के की उपज का वाजिब दाम मिले इसके लिए सरकार पहले ही इसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के दायरे में ला चुकी है।

इसमें काबोर्हाइड्रेड, शुगर, वसा, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल मिलता है। इस लिहाज से मक्का की खेती कुपोषण के खिलाफ जंग साबित हो सकती है। इन्हीं खूबियों की वजह से मक्के को अनाजों की रानी कहा गया है। विशेषज्ञों की मानें तो उन्नत खेती के जरिये मक्के की प्रति हेक्टेयर उपज 100 क्विंटल तक भी संभव है। प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन लेने वाले तमिलनाडु की औसत उपज 59.39 कुंतल है। देश के उपज का औसत 26 कुंतल एवं उत्तर प्रदेश के उपज का औसत 2021-22 में 21.63 कुंतल प्रति हेक्टेयर था। ऐसे में यहां मक्के की उपज बढाने की भरपूर संभावना है।

क्रील सिस्टम इनीसिएटिव फार साउथ एशिया (सीसा) के वैज्ञानिक डा. अजय के अनुसार, खरीफ के फसल की बोआई के लिए 15 जून से 15 जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। अगर सिंचाई की सुविधा हो तो मई के दूसरे-तीसरे हफ्ते में भी इसकी बोआई की जा सकती है। इससे मानसून आने तक पौधे ऊपर आ जाएंगे और भारी बारिश से होने वाली क्षति नहीं होगी। प्रति एकड़ करीब 8 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है। अच्छी उपज के लिए बोआई लाइन में करें।

लाइन से लाइन की दूरी 60 सेमी एवं पौधे से पौधे की दूरी 20 सेमी रखें। उपलब्ध हो तो बेडप्लान्टर का प्रयोग करें। कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों की बोआई करें। डंकल डबल, कंचन 25, डीकेएस 9108, डीएचएम 117, एचआरएम-1, एनके 6240, पिनैवला, 900 एम और गोल्ड आदि प्रजातियों की उत्पादकता ठीकठाक है। वैसे तो मक्का 80-120 दिन में तैयार हो जाता है। पर पापकार्न के लिए यह सिर्फ 60 दिन में ही तैयार हो जाता है।

ये भी पढ़ें : Punjab Weather Update: इन जिलों में आज आंधी-तूफान का अलर्ट, जानें अगले 7 दिनों के मौसम हाल

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें