Last Updated: October 4, 2026

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RBI के निर्णय पर बाजार की नजर, रेपो रेट और आर्थिक संकेतों पर ध्यान

February 6, 2026

RBI के निर्णय पर बाजार की नजर, रेपो रेट और आर्थिक संकेतों पर ध्यान

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) शुक्रवार को प्रमुख नीतिगत ब्याज दर पर अपना फैसला सुनाने जा रही है। ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दिसंबर 2025 में ब्याज दर में कटौती के बाद फरवरी की बैठक में आरबीआई फिलहाल दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि, आगे की नीति को लेकर केंद्रीय बैंक क्या संकेत देता है, इस पर बाजार की खास नजर रहेगी।

आरबीआई की तीन दिन तक चलने वाली एमपीसी बैठक बुधवार से शुरू हो चुकी है। डीबीएस बैंक की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव के मुताबिक, मजबूत आर्थिक वृद्धि और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के बाद वैश्विक जोखिम कुछ कम हुए हैं, ऐसे में रिजर्व बैंक आने वाले समय को देखते हुए संतुलित और लचीला रुख अपना सकता है।

राव ने कहा कि महंगाई में नरमी के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है। साथ ही, बैंकों के सामने डिपॉजिट जुटाने की चुनौती और पोर्टफोलियो आउटफ्लो का जोखिम भी है। इन कारणों से आरबीआई फिलहाल आगे किसी रेट कट से बच सकता है।

जानकारों का मानना है कि इस बार रिजर्व बैंक की प्राथमिकता नकदी प्रबंधन, बॉन्ड बाजार को स्थिर रखना और मुद्रा प्रबंधन जैसे कदमों पर रहेगी। मौजूदा तिमाही के साथ-साथ अप्रैल से जून 2026 के दौरान भी सरकारी बॉन्ड की खरीद जारी रह सकती है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भले ही नीतिगत ब्याज दरों में पहले ढील दी गई हो, लेकिन हाल के महीनों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड में लगातार तेजी देखी गई है। इसी वजह से आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति में यथास्थिति बनाए रख सकता है।

एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) की प्रभावशीलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि किन सिक्योरिटीज का चयन किया जाता है, भले ही लिक्विडिटी डालने की कुल मात्रा में बदलाव न हो। इसी आधार पर रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि आगामी नीति में आरबीआई दरों को स्थिर रखेगा।

पिछली मौद्रिक नीति के बाद सबसे बड़ा बदलाव भारत का यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता माना जा रहा है। इस समझौते के बाद भारत पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।

एसबीआई रिसर्च के अनुसार, इससे भारत अब एशियाई देशों में सबसे कम शुल्क वाले देशों की श्रेणी में आ गया है। इसका फायदा यह होगा कि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे और निर्यात को मजबूती मिलेगी।

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