नई दिल्ली: देश के चावल निर्यातकों ने आगामी केंद्रीय बजट 2026-27 से कई अहम राहत उपायों की अपेक्षा जताई है। भारतीय चावल निर्यातक संघ (आईआरईएफ) ने सरकार से टैक्स इंसेंटिव, निर्यात ऋण पर ब्याज सब्सिडी और परिवहन सहायता जैसे कदम उठाने का अनुरोध किया है, ताकि बढ़ती लागत, बाजार की अनिश्चितता और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच इस सेक्टर की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनी रह सके।
संघ ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपे गए ज्ञापन में निर्यात कर्ज पर 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी, सड़क और रेल माल ढुलाई पर 3 प्रतिशत सहायता तथा आरओडीटीईपी (निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और कर वापसी योजना) के तहत लंबित दावों के समय पर निपटान की मांग रखी है।
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लागत घटेगी, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी
आईआरईएफ के अध्यक्ष प्रेम गर्ग के अनुसार, प्रस्तावित उपायों से निर्यातकों की लागत में सीधी कमी आएगी और मूल्यवर्धित चावल के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि वैश्विक चावल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है और वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 170 से अधिक देशों को लगभग 2.01 करोड़ टन चावल का निर्यात किया।
गर्ग ने कहा कि चावल निर्यात न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है, बल्कि ग्रामीण रोजगार और विदेशी मुद्रा अर्जन का भी एक अहम जरिया है।
कई मोर्चों पर चुनौतियां
संघ के मुताबिक, इस क्षेत्र को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में गिरता भूजल स्तर, खरीद और भंडारण की बढ़ती लागत तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव शामिल है। आईआरईएफ का मानना है कि लक्षित वित्तीय और नीतिगत समर्थन के जरिए सरकार इन चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकती है।
टिकाऊ खेती पर जोर
चावल उत्पादन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए संघ ने जल-बचत और कम उत्सर्जन वाली तकनीकों को बढ़ावा देने की भी मांग की है। इसमें वैकल्पिक गीलापन एवं सुखाने (AWD), सीधे बोए गए चावल (DSR), लेजर लेवलिंग और ऊर्जा-कुशल मिलिंग तकनीकों के लिए टैक्स और निवेश प्रोत्साहन शामिल हैं।
इसके साथ ही, किसानों को बेहतर दाम दिलाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर निर्भरता कम करने के लिए प्रीमियम बासमती, जीआई टैग वाले, जैविक और विशेष गैर-बासमती चावल की खेती को प्रोत्साहित करने का सुझाव भी दिया गया है।
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निर्यात शुल्क विवाद पर राहत की मांग
वर्किंग कैपिटल की समस्या को देखते हुए आईआरईएफ ने खासतौर पर छोटे और मझोले निर्यातकों के लिए निर्यात ऋण पर 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी की मांग दोहराई है। संघ का कहना है कि इससे फाइनेंसिंग लागत घटेगी और नकदी प्रवाह बेहतर होगा।
इसके अलावा, कुछ चावल किस्मों पर लगाए गए 20 प्रतिशत निर्यात शुल्क के बाद बने पूर्वव्यापी शुल्क दावों को एकमुश्त माफ करने की भी मांग की गई है। संघ के अनुसार, अलग-अलग स्तर पर नियमों की भिन्न व्याख्या के कारण कई निर्यातकों को अनजाने में परेशानी झेलनी पड़ी।
आईआरईएफ ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रीमियम बाजारों में भारत की साख बनाए रखने के लिए निर्यात वित्त गारंटी और गुणवत्ता जांच, ट्रेसबिलिटी तथा अनुपालन से जुड़े बुनियादी ढांचे को और मजबूत करना जरूरी है।

