Rupee Vs Dollar : भारतीय मुद्रा ने एक नया मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के ऊपर फिसल गया है, जिससे बाजार और आम निवेशकों के बीच चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। यह गिरावट ऐसे वक्त आई है, जब घरेलू शेयर बाजार दबाव में हैं और विदेशी निवेशक लगातार पूंजी निकाल रहे हैं। इसके बावजूद अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसे आर्थिक संकट के संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने हाल के महीनों में रुपये को सहारा देने के लिए कई कदम उठाए, जिनमें विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और दिसंबर 2025 में 25 बेसिस प्वाइंट की रेपो रेट कटौती भी शामिल है। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है।

गिरावट के पीछे क्या है असली वजह?
एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि रुपये में आगे भी कुछ कमजोरी देखने को मिल सकती है। लेकिन यह किसी असाधारण स्थिति का संकेत नहीं है। उनके मुताबिक, केंद्रीय बैंक को किसी खास एक्सचेंज रेट को बचाने के बजाय बाजार को स्वाभाविक संतुलन बनाने देना चाहिए।
मिश्रा के अनुसार, भारत के पास 685 से 690 अरब डॉलर का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जो किसी भी बाहरी झटके से निपटने के लिए पर्याप्त है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पहले रुपये को 83 के स्तर पर थामे रखने और फॉरवर्ड मार्केट में जरूरत से ज्यादा दखल देने का असर अब दिखाई दे रहा है, जिसकी परिणति मौजूदा कमजोरी के रूप में सामने आई है।
आगे और कमजोर हो सकता है रुपया
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये पर दबाव केवल घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक कारकों से भी जुड़ा है। अमेरिका में मजबूत डॉलर, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक निवेशकों का सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव ये सभी कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को कमजोर कर रहे हैं।
इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारतीय शेयर बाजार से निकासी और सट्टेबाजी गतिविधियों ने भी मुद्रा बाजार की अस्थिरता बढ़ाई है। नीलकंठ मिश्रा का अनुमान है कि जून 2027 तक रुपया 92 से 94 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में पहुंच सकता है, लेकिन इसे भारत की आर्थिक कमजोरी से जोड़ना सही नहीं होगा।
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क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पर खतरा है?
मिश्रा साफ कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों द्वारा भारत में निवेश की प्रतिबद्धताएं, संतुलित भुगतान संतुलन और मजबूत घरेलू मांग इस मजबूती को दर्शाती हैं।अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को लेकर भी उनका मानना है कि भारत को किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए, खासकर तब जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ से जुड़े अहम मामलों पर फैसला आना बाकी है।