मुंबई : भारतीय रिजर्व बैंक ने उम्मीद के मुताबिक प्रमुख नीतिगत ब्याज दर रेपो को 0.25% बढ़ाकर 5.50% कर दिया। करीब 4 साल में यह रेपो दर में पहली बढ़ौतरी है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने महंगाई बढ़ने और रुपए की विनिमय दर में गिरावट के साथ नीतिगत रुख बदलते हुए आने वाले समय में भी दर बढ़ाने के संकेत दिए। रेपो वह ब्याज दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं।
आरबीआई के रेपो दर बढ़ाने से आवास, वाहन समेत अन्य कर्ज महंगे होंगे। मौजूदा कर्जदारों की मासिक किस्त भी बढ़ सकती है। 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने आम सहमति से रेपो दर बढ़ाने के पक्ष में फैसला किया। दिसंबर, 2024 में गवर्नर संजय मल्होत्रा के पदभार संभालने के बाद यह पहला मौका है जब नीतिगत दर बढ़ाई गई है। ये फरवरी, 2023 के बाद पहला मौका है जब नीतिगत दर में वृद्धि की गई है। इससे पहले पिछले साल फरवरी से दिसंबर, 2025 तक रेपो दर में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की गई थी।
इस साल फरवरी, अप्रैल, जून तथा अगस्त की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में नीतिगत दर में कोई बदलाव नहीं किया गया था। आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहने के बावजूद महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति अगस्त में बढ़कर 4.82% हो गई, जो लगातार तीसरे महीने आरबीआई के 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर रही। इस दौरान मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति भी बढ़कर 4.2% हो गई।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि महंगाई का जोखिम अब एक साल पहले की तुलना में अधिक बढ़ गया है। इसका कारण खाद्य और ईंधन की ऊंची कीमतों, मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति तथा अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों में फिर से बढ़ी अस्थिरता है। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई के औसतन 5.2% रहने का अनुमान जताया है। तीसरी तिमाही में इसके छह प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7% रहने का अनुमान है।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी रही, हालांकि, वृद्धि की गति कुछ धीमी हुई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में विस्तार जारी रहा, जबकि पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन, कर्ज वृद्धि और उपभोक्ता खर्च आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दे रहे हैं। आरबीआई का नीतिगत रुख में बदलाव बढ़ते महंगाई दबाव को नियंत्रित करने और मजबूत घरेलू वृद्धि को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाता है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, वैश्विक जोखिम भी बढ़े हैं।
पश्चिम एशिया में संघर्ष, बॉण्ड पर प्रतिफल में वृद्धि, व्यापार संबंधी अनिश्चितता और कृत्रिम मेधा से जुड़ी कंपनियों के शेयरों के मूल्यांकन में तेज गिरावट के जोखिम आर्थिक परिदृश्य के लिए खतरा हैं। नीतिगत दर पर फैसला ऐसे समय हुआ है जब बैंकों में नकदी की उपलब्धता पर्याप्त बनी हुई है और कर्ज वृद्धि तेज हुई है।

