Site icon Dainik Savera Times

दुष्कर्म पीड़िता की मर्जी सर्वोपरि, जबरन मां बनाना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Adoptive mothers get 12 weeks maternity leave, Supreme Court

Adoptive mothers get 12 weeks maternity leave, Supreme Court

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी भी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर जब मामला दुष्कर्म से जुड़ा हो। अदालत ने साफ किया कि महिला की शारीरिक आज़ादी और सम्मान सबसे ज़रूरी है।

यह टिप्पणी उस मामले में आई, जिसमें एक दुष्कर्म पीड़िता ने अदालत से गर्भपात की अनुमति मांगी थी। महिला का कहना था कि वह इस गर्भ को जारी नहीं रखना चाहती, क्योंकि यह उसके साथ हुए अपराध की दर्दनाक याद से जुड़ा है।

पीड़िता की सहमति के बिना मातृत्व थोपना गलत: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला को अपने शरीर और भविष्य से जुड़े फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार है। अदालत ने यह भी माना कि दुष्कर्म जैसी घटना के बाद महिला पर जबरन मातृत्व थोपना उसके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कानून का मकसद पीड़िता की मदद करना है, न कि उसे और पीड़ा देना। ऐसे मामलों में महिला की सहमति सबसे अहम है और उसकी इच्छा के खिलाफ कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।

फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम

इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अदालत ने यह संदेश भी दिया कि समाज और व्यवस्था को पीड़ित महिला के दर्द को समझना चाहिए और उसे सम्मान के साथ जीने का हक देना चाहिए।

Exit mobile version