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Axiom-4 Mission : पृथ्वी से International Space Station सिर्फ 400 KM दूर, फिर 29 घंटे क्यों ?

नेशनल डेस्क : भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला Axiom-4 मिशन के तहत 25 जून को भारतीय समयानुसार दोपहर करीब 12 बजे फ्लोरिडा के नासा कैनेडी स्पेस सेंटर से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) की ओर रवाना हो चुके है। वहीं आज यानी 26 जून को भारतीय समयानुसार शाम साढ़े 4 बजे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से डॉक करेगा।आपको जानकर हैरानी होगी कि पृथ्वी से ISS की दूरी केवल 400 किलोमीटर है। यानी यह उतनी ही दूरी है जितनी कोई विमान एक शहर से दूसरे शहर तक तय करता है। फिर भी इस यात्रा में 28 से 29 घंटे लगते हैं। क्यों? इसका जवाब अंतरिक्ष की जटिलता और अत्याधुनिक तकनीक में छिपा है। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…

अंतरिक्ष की यात्रा क्यों है इतनी जटिल ?

अंतरिक्ष में जाने के लिए चाहिए बेहद तेज रफ्तार

ISS धरती से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है, लेकिन यह बहुत तेज़ गति से लगभग 27,800 किलोमीटर प्रति घंटे पृथ्वी का चक्कर लगाता है। अंतरिक्ष यान को भी इसी गति से अपनी दिशा और गति को संतुलित रखते हुए ISS के करीब पहुंचना होता है। ये कोई सामान्य ट्रैफिक नहीं, बल्कि एकदम सटीक गति और दिशा का खेल है।

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलना आसान नहीं

किसी भी यान को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर निकलने और सही कक्षा (Orbit) में प्रवेश करने के लिए बेहद ज्यादा ऊर्जा और गति की आवश्यकता होती है। लॉन्चिंग के समय यान को कई चरणों में नियंत्रित गति से आगे बढ़ाया जाता है, ताकि किसी भी गड़बड़ी या टक्कर से बचा जा सके।

ISS तक पहुंचने की प्रक्रिया होती है बेहद सटीक

शुभांशु शुक्ला का स्पेसक्राफ्ट ‘ड्रैगन’ जब ISS की तरफ बढ़ रहा है, तो वह सीधी लाइन में नहीं जाता। उसे ISS की कक्षा में धीरे-धीरे घुसना होता है और इसकी स्पीड को वैसा ही रखना होता है जैसा स्पेस स्टेशन की है। यह प्रक्रिया “डॉकिंग” कहलाती है, और यह सबसे संवेदनशील चरण होता है। ज़रा सी चूक से बड़ा हादसा हो सकता है।

अंतरिक्ष की यात्रा में कौन-कौन सी चुनौतियां होती हैं?

-नेविगेशन की दिक्कतें: अंतरिक्ष में सही दिशा और गति बनाए रखना बेहद मुश्किल होता है। एक छोटा सा डिग्री का अंतर यान को ISS से चूकवा सकता है।

-तकनीकी खराबियां: लॉन्च के समय या रास्ते में सिस्टम फेल हो सकते हैं, जैसे इंजन रुकना, ईंधन लीक होना या संचार टूटना।

-अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत: माइक्रोग्रैविटी यानी कम गुरुत्व में मांसपेशियां कमजोर पड़ती हैं, और उल्टी-चक्कर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

-विकिरण और मलबा: अंतरिक्ष में घातक विकिरण और तेज रफ्तार से घूमते मलबे (Debris) होते हैं, जो यान से टकराकर नुकसान कर सकते हैं।

इन्हीं सब जोखिमों को ध्यान में रखकर अंतरिक्ष यात्रा को धीमा और सुरक्षित बनाया जाता है।

क्या है ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट की खासियत ?

सबसे भरोसेमंद स्पेस यान

SpaceX का ड्रैगन यान एक मल्टी-मिशन स्पेसक्राफ्ट है, जिसने अब तक 51 सफल मिशन पूरे किए हैं। यह 46 बार अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जा चुका है और 31 बार वापसी के बाद दोबारा अंतरिक्ष गया है। यानी यह बार-बार प्रयोग होने वाला यान है, जो इसे बाकी यानों से अलग बनाता है।

 सात यात्रियों को ले जाने की क्षमता

ड्रैगन एक साथ 7 अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा और उससे आगे तक ले जा सकता है। यही नहीं, यह वापस आ सकता है और दोबारा इस्तेमाल हो सकता है, जो इसे आर्थिक रूप से भी कारगर बनाता है।

 थ्रस्टर्स और सुरक्षा सिस्टम से लैस

ड्रैगन में ड्रेको थ्रस्टर्स लगे हैं, जो इसे किसी भी कक्षा में दिशा बदलने की क्षमता देते हैं। इसमें 8 सुपरड्रेको इंजन भी हैं जो इमरजेंसी में रॉकेट से अलग होकर यान को सुरक्षित बाहर निकाल सकते हैं, इसे लॉन्च एस्केप सिस्टम कहा जाता है।



तकनीकी संरचना

यह यान तकनीकी रूप से बहुत परिष्कृत है और वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अंतरिक्ष यात्रियों के भरोसेमंद साथी की तरह काम करता है।

भारत के लिए गौरव का क्षण

शुभांशु शुक्ला का अंतरिक्ष जाना सिर्फ एक मिशन नहीं, बल्कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक मील का पत्थर है। इसने दिखा दिया है कि भारत अब सिर्फ धरती पर ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी आत्मनिर्भर बनता जा रहा है।

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